जातिगत जनगणना का जाल क्यों बिछा रहा विपक्ष? भाजपा को लग सकता है झटका
बेंगलुरु में हुई बैठक में विपक्ष ने एक बार फिर जातिगत जनगणना की मांग दोहराई थी। विपक्ष का मानना है कि अगर जातिगत जनगणना हुई तो भाजपा को हिंदू वोट बैंक बिखऱ जाएगा।

बेंगलुरु में दो दिनों की बैठक के बाद साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान एक बार फिर विपक्ष ने जातिगत जनगणना की मांग दोहराई। वैसे तो जातिगत जनगणना की मांग कोई नई नहीं है लेकिन विपक्ष इसे 2024 के लिए एक हथियार के रूप में देख रहा है। वहीं भाजपा को इस बात का डर है कि कहीं अगड़ी जातियों का वोटबैंक उसके हाथ से फिसल ना जाए। भाजपा का एक बड़ा हिंदू वोटबैंक है जिसमें सवर्ण वर्ग शामिल है। वहीं पिछड़ी जातियों का वोट बंटा हुआ है।
यूपीए सरकार ने करवाई थी जातिगत जनगणना
2010-11 की जनगणना में जातिगत जनगणना करवाई गई थी लेकिन आंकड़े आज तक नहीं जारी किए गए। कर्नाटक में भी साल 2015 में जातिगत जनगणना करवाई गई पर आंकड़े नहीं जारी किए गए। बिहार में नीतीश कुमार की सरकार ने जातिगत सर्वे कराना शुरू किया था लेकिन अब यह मामला अदालत में है। खास बात यहा है कि जब नीतीश ने यह फैसला किया तब भाजपा उसकी सहयोगी थी। हालांकि अब भाजपा से अलग होकर नीतीश ने आरजेडी के साथ सरकार बना ली है।
जातिगत जनगणना नए विवाद की जड़?
जातिगत जनगणना को लेकर एक डर भी है। दरअसल अगर इस तरह जनगणना होती है तो आरक्षण का संकट गहरा जाएगा। इन आंकड़ों के आधार पर आरक्षण की मांग की जाएगी। देश में आरक्षण के लिए लंबे समय से आंदोलन होते रहे हैं। ऐसा भी हो सकता है कि आरक्षण को लेकर कई आंदोलन खड़े हो जाएं। वहीं जानकारों का कहना है कि जातिगत जनगणना से विपक्ष को ज्यादा फायदा हो सकता है। क्योंकि इसका फायदा पिछड़ी जातियों को मिल सकता है।
अगर 2011 में हुई जातिगत जनगणना के आंकड़े सार्वजनिक किए जाते हैं और फिर दोबारा जातिगत जनगणना होती है तो भी भाजपा मुश्किल में फंस सकती है। दरअसल 2011 से अब तक ज्यादातर भाजपा का ही शासन रहा है। ऐसे में किसी जाति या वर्ग की संख्या कम होने पर भी भाजपा पर सवाल उठाया जाएगा। अब बड़ा सवाल यह है कि विपक्ष आम आदमी को जातिगत जनगणना की जरूरत और महत्व के बारे में समझा पाता है कि नहीं। अगर यह मांग केवल अपर क्लास तक सीमित रही तो विपक्ष को ज्यादा फायदा नहीं होगा।
ब्रिटिश शासनकाल में कई बार जनगणना करवाई गई और इसमें जाति की जानकारी भी दर्ज की जाती थी। हालांकि आजादी के बाद से इसमें केवल अनुसूचित जाति और जनजाति को ही जोड़ा गया। सरकार का कहना हैकि 2010 में जो जातिगत जानकारी इकट्ठा की गई उसमें कई तरह की खामियां थीं इसलिए उसे सार्वजनिक नहीं किया गया। हालांकि इस बार की मांग 2024 में कितना बड़ा हथियार बनेगी, यह आने वाला वक्त ही बता सकता है।
2010-11 की जनगणना में जातिगत जनगणना करवाई गई थी लेकिन आंकड़े आज तक नहीं जारी किए गए। कर्नाटक में भी साल 2015 में जातिगत जनगणना करवाई गई पर आंकड़े नहीं जारी किए गए। बिहार में नीतीश कुमार की सरकार ने जातिगत सर्वे कराना शुरू किया था लेकिन अब यह मामला अदालत में है। खास बात यहा है कि जब नीतीश ने यह फैसला किया तब भाजपा उसकी सहयोगी थी। हालांकि अब भाजपा से अलग होकर नीतीश ने आरजेडी के साथ सरकार बना ली है।
जातिगत जनगणना नए विवाद की जड़?
जातिगत जनगणना को लेकर एक डर भी है। दरअसल अगर इस तरह जनगणना होती है तो आरक्षण का संकट गहरा जाएगा। इन आंकड़ों के आधार पर आरक्षण की मांग की जाएगी। देश में आरक्षण के लिए लंबे समय से आंदोलन होते रहे हैं। ऐसा भी हो सकता है कि आरक्षण को लेकर कई आंदोलन खड़े हो जाएं। वहीं जानकारों का कहना है कि जातिगत जनगणना से विपक्ष को ज्यादा फायदा हो सकता है। क्योंकि इसका फायदा पिछड़ी जातियों को मिल सकता है।
अगर 2011 में हुई जातिगत जनगणना के आंकड़े सार्वजनिक किए जाते हैं और फिर दोबारा जातिगत जनगणना होती है तो भी भाजपा मुश्किल में फंस सकती है। दरअसल 2011 से अब तक ज्यादातर भाजपा का ही शासन रहा है। ऐसे में किसी जाति या वर्ग की संख्या कम होने पर भी भाजपा पर सवाल उठाया जाएगा। अब बड़ा सवाल यह है कि विपक्ष आम आदमी को जातिगत जनगणना की जरूरत और महत्व के बारे में समझा पाता है कि नहीं। अगर यह मांग केवल अपर क्लास तक सीमित रही तो विपक्ष को ज्यादा फायदा नहीं होगा।
ब्रिटिश शासनकाल में कई बार जनगणना करवाई गई और इसमें जाति की जानकारी भी दर्ज की जाती थी। हालांकि आजादी के बाद से इसमें केवल अनुसूचित जाति और जनजाति को ही जोड़ा गया। सरकार का कहना हैकि 2010 में जो जातिगत जानकारी इकट्ठा की गई उसमें कई तरह की खामियां थीं इसलिए उसे सार्वजनिक नहीं किया गया। हालांकि इस बार की मांग 2024 में कितना बड़ा हथियार बनेगी, यह आने वाला वक्त ही बता सकता है।
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