तीन 'R' वाले प्लान से जाति जनगणना की काट निकालेगी भाजपा, आम चुनाव से पहले होगा बड़ा बदलाव?
जातिगत जनगणना के आंकड़े जारी होने के बाद भाजपा के सामने हिंदू वोट बैंक के बंटने की चुनौती खड़ी है। ऐसे में सबसे ज्यादा जरूरी है ओबीसी वोट को संभालना जिसके लिए भाजपा का प्लान तैयार है।

बिहार में जातिगत जनगणना के आंकड़े जारी होने के बाद भाजपा के लिए एक चुनौती खड़ी हो गई है। इन आंकड़ों में सबसे ज्यादा जनसंख्या पिछड़ों की है। विपक्ष एक बार फिर से मंडल पॉलिटिक्स करने के मूड में है। वहीं भाजपा को अपने मजबूत हिंदू वोटबैंक की चिंता सता रही है। जाति आधारित राजनीति हिंदू राजनीति के बीच बड़ी बाधा बन जाती है। वहीं विपक्षी गठबंधन ने ओबीसी पॉलिटिक्स की ओर कदम बढ़ा दिया है। इससे पहले महिला आरक्षण कानून को लेकर भी विपक्ष यही मांग कर रहा था कि कोटा के अंदर ओबीसी का अलग कोटा निर्धारित होना चाहिए।
विपक्षी गठबंधन INDIA लगातार जाति आधारित जनगणना की मांग कर रहा है। हालांकि भाजपा किसी भी कीमत पर जातीय स्तर पर हिंदू वोट को बंटने नहीं देना चाहती। अमित शाह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व मे भाजपा के 29 फीसदी सांसद ओबीसी से हैं। इसके अलावा 29 केंद्रीय मंत्री और कुल 1358 विधायकों में से 365 विधायक ओबीसी वर्ग से आते हैं। वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कहा कि विपक्ष जाति के आधार पर हिंदुओं को बांटना चाहता है।
कैसे काट निकालेगी भाजपा?
जातिगत जनगणना और आरक्षण का काट निकालने के लिए भाजपा तीन 'R' का सहारा ले सकती है। इसमें पहला है रोहिणी कमीशन की सिफारिशों को लागू करना। दूसरा है राम मंदिर और तीसरा है रिजर्वेशन। जनवरी में अयोध्या में राम मंदिर का उद्घाटन होने वाला है। यह मामला भी हिंदुओं की भावनाओं से जुड़ा है जिसका इस्तेमाल भाजपा आगामी चुनावों में कर सकती है। बता दें कि रोहिणी कमीशन की रिपोर्ट को भी अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है।
क्या है रोहिणी आयोग
बताया जा रहा है कि रोहिणी आयोग की रिपोर्ट अगले साल होने जा रहे लोकसभा चुनाव में सोशल इंजीनियरिंग को लेकर बड़ी भूमिका निभाने वाली है। यह रिपोर्ट राष्ट्रपति को सौंपी जा चुकी है। बता दें कि साल 2017 में ओबीसी के सब कैटेगरी के परीक्षण के लिए रोहिणी आयोग का गठन किया गया था। इसकी अध्यक्ष दिल्ली हाई कोर्ट से रिटायर्ड जज जी रोहिणी हैं। इस आयोग को 14 बार विस्तार दिया जा चुका है। इस आयोग से ओबीसी जातियों के बीच उनके हिस्से के 27 फीसदी आरक्षण को विभाजित करने की सिफारिश करने को कहा गया था।
संख्या के आधार पर आरक्षण को तय करने को लेकर इस आयोग का गठन किया गया था। शिकायतें आती थीं कि ओबीसी की कुछ मजबूत जातियां कमजोरों का आरक्षण हड़प कर जाती हैं। वहीं राजनीतिक पंडितों का कहना है कि पिछड़ों को लुभाने के लिए यह भाजपा की रणनीति का हिस्सा है। अगर केंद्र सरकार रोहिणी आयोग कि सिफारिश के आधार पर ओबीसी आरक्षण की संरचना को बदलती है तो यह भाजपा के लिए बेहद अहम होगा। ओबीसी आरक्षण को लेकर बिहार ही नहीं बल्कि गुजरात, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र हिमाचल और राजस्थान में भी आंदोलन हो चुके हैं।
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