जज कोई रिकॉर्डिंग मशीन नहीं होता, SC ने हाई कोर्ट पर जताई नाराजगी; पूरा मामला
सुप्रीम कोर्ट ने बिहार के भागलपुर के एक मामले में पटना हाई कोर्ट और निचली अदालत की जमकर आलोचना की। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कोई भी जज मूकदर्शक बनकर रिकॉर्डिंग मशीन की तरह काम नहीं कर सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में पटना हाई कोर्ट और निचली अदालत की कड़ी आलोचना की है साथ ही हाई कोर्ट के आदेश को भी रद्द कर दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि निष्पक्ष होने के यह कतई मतलब नहीं है कि कोई अपनी आंखें बंद कर लेगा और एक रिकॉर्डिंग मशीन की तरह काम करने लगेगा। पटना हाई कोर्ट ने निचली अदालत के उस फैसले को बरकरार रखा था जिसमें 10 साल की लड़की के रेप और मर्डर के आरोप में एक शख्स को फांसी की सजा सुनाई गई थी। उसपर आरोप था कि उसने 2015 में उसके घर आई लड़की के साथ बलात्कार किया और फिर गला घोंटकर हत्या कर दी। हालांकि हाई कोर्ट ने फैसले में कई खामियां रेखांकित कीं और मामले को वापस सुनवाई के लिए हाई कोर्ट भेज दिया।
शख्स ने मौत की सजा को सुप्रीम कोर्ट ने चुनौती दी थी। जस्टिस जेबी पारदीवाला ने फैसले में कहा, एक निष्पक्ष सुनवाई वह होती है जिसमें नियमों और सबूतों का सम्मान किया जाता है। आरोपी, वकील और जज सभी कोर्ट रूम के नियमों का पालन करते हैं। जो ट्रायल धारणा के आधार पर होता है उसे चुनौती दी जा सकती है। अगर फ्री और फेयर ट्रायल नहीं होगा तो जनता का न्याय व्यवस्था से विश्वास उठ जाएगा। किसी भी केस को निष्पक्ष तब तक नहीं माना जा सकता जब तक कि कोई निष्पक्ष जज सुनवाई ना कर रहा हो। इसके अलावा वकील और अभियोजक भी निष्पक्ष होने चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि निष्पक्ष न्याय के लिए यह भी जरूरी है कि कोई जज मूकदर्शक बनकर रिकॉर्डिंग मशन की तरह काम ना करे। उसे पता होना चाहिए कि आसपास क्या हो रहा है। अगर कोर्ट घटना से जुड़ी चीजों में सक्रिय रहता है और ध्यान से चीजों को समझता है तभी सही फैसला होसकता है। उन चीजों पर गौर करना जरूरी है जो कि फैसले के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं।
बता दें कि भागलपुर की निचली अदालत ने साल 2017 में रेप और हत्या के आरोपी को मौत की सजा सुनाई थी। उसने पटना हाई कोर्ट में याचिका दायर की तो 2018 में इसे खारिज कर दिया गया और मृत्युदंड को बरकरार रखा गया। सजायाफ्ता ने सुप्रीम कोर्ट में सजा के खिलाफ याचिका दायर की तो इसकी सुनवाई जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की बेंच कर रही थी। कोर्ट ने कहा कि पूरी जांच में बहुत सारी कमियां हैं। फॉरेंसिक लैब की रिपोर्ट तक का पता नहीं है। कोर्ट ने कहा कि जांच अधिकारी ने याचिकाकर्ता की मेडिकल जांच भी नहीं करवाई थी। कोर्ट ने इस केस को ऐसी पीठ को सौंपने को कहा है जो शीघ्रता से फैसला करे। आरोपी 9 साल से जेल में है।
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