when lalkrishna advani denies lok sabha ticket to son jayant advani - India Hindi News जब लालकृष्ण आडवाणी ने बेटे के राजनीतिक करियर पर शुरू होने से पहले ही लगा दिया ब्रेक, India Hindi News - Hindustan
Hindi Newsदेश न्यूज़when lalkrishna advani denies lok sabha ticket to son jayant advani - India Hindi News

जब लालकृष्ण आडवाणी ने बेटे के राजनीतिक करियर पर शुरू होने से पहले ही लगा दिया ब्रेक

भाजपा के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी को सिद्धांतों की राजनीति के लिए जाना जाता है। वह वंशवाद के खिलाफ थे तो उसे खुद पर भी उतारा और हमेशा अमल किया। उन्होंने बेटे को भी चुनाव नहीं लड़ने दिया था।

Surya Prakash लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्लीThu, 9 Nov 2023 12:49 PM
share Share
Follow Us on
जब लालकृष्ण आडवाणी ने बेटे के राजनीतिक करियर पर शुरू होने से पहले ही लगा दिया ब्रेक

भाजपा के वयोवृद्ध नेता लालकृष्ण आडवाणी 96 साल को हो गए हैं। वह देश की मौजूदा राजनीति में भीष्म पितामह सरीखे हैं और उतने ही बड़े उनके आदर्श भी रहे हैं। अपने करीब 7 दशक के करियर में शुचितापूर्ण राजनीति के पर्याय रहे आडवाणी का मानना था कि जिन मूल्यों पर वह दूसरे दलों को घेरते हैं, उन पर अमल भी करें। जैन हवाला कांड में नाम आने पर बेदाग साबित होने तक उनके इस्तीफे की बात हो या फिर वंशवाद के खिलाफ जंग, आडवाणी को ईमानदार राजनीति के लिए हमेशा ही याद किया जाएगा। ऐसा ही एक वाकया उनके बेटे जयंत आडवाणी से भी जुड़ा है।

दरअसल 1989 का दौर वह था, जब भाजपा अपने उत्कर्ष पर थी और राम मंदिर आंदोलन के चलते दिल्ली, गुजरात, यूपी, राजस्थान समेत पूरे उत्तर और पश्चिम भारत में पार्टी की धमक बढ़ रही थी। इस दौरान भाजपा के एक नेता और उनके करीबी हरिन पाठक ने सुझाव दिया कि आडवाणी अपने बेटे जयंत को गांधीनगर से उम्मीदवार बना दें और खुद नई दिल्ली से लड़ें। इस प्रस्ताव को आडवाणी ने तुरंत ही खारिज कर दिया। उनका तर्क था कि यदि बेटे जयंत को टिकट दिया गया तो फिर यह वंशवाद के खिलाफ उनकी जंग को कमजोर करेगा। 

विश्वंभर श्रीवास्तव की किताब 'आडवाणी के साथ 32 साल' में इस वाकये का विस्तार से जिक्र है। पुस्तक के मुताबिक पाठक के आग्रह पर आडवाणी कहते हैं, 'जयंत गांधीनगर से आसानी से जीत सकते हैं। लेकिन मैं उन्हें चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं दूंगा।' इस तरह आडवाणी ने बेटे जयंत की राजनीतिक यात्रा शुरू होने से पहले ही उस पर ब्रेक लगा दिया। हालांकि एक बार खुद जयंत ने 1991 में चुनाव लड़ने की इच्छा जाहिर की थी, लेकिन उन्हें कभी मौका नहीं मिला। ना ही आडवाणी ने कभी उन्हें चुनाव मैदान में उतारने के लिए प्रमोट किया।

सीट हाथ से चली गई, पर बेटे को नहीं लड़ने दिया चुनाव

आडवाणी खुद 1989 में गांधीनगर और नई दिल्ली सीट से चुनाव लड़े। वह दोनों पर ही जीत गए, लेकिन नई दिल्ली सीट खाली कर दी। यहां पर उपचुनाव हुआ, जिसमें कांग्रेस से राजेश खन्ना जीत गए। इस तरह भाजपा के हाथ से एक सीट भले चली गई, लेकिन आडवाणी ने परिवारवाद के खिलाफ अपनी जंग को देखते हुए बेटे को चुनाव नहीं लड़ने दिया। हिंदुत्व के पोस्टरबॉय रहे आडवाणी का भाजपा में उस दौर में इतना कद था कि उनकी राय टाली नहीं जाती, फिर भी उनके इस रुख को आज भी लोग याद करते हैं।

लेटेस्ट   Hindi News ,    बॉलीवुड न्यूज,   बिजनेस न्यूज,   टेक ,   ऑटो,   करियर , और   राशिफल, पढ़ने के लिए Live Hindustan App डाउनलोड करें।