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'ठाकुर के कुएं' से किसे मिलेगा मीठा पानी और किसकी राजनीति होगी खारी, समझें समीकरण

Rajput vs Brahmin in Bihar: देखा जाए तो आनंद मोहन की राजनीति मंडल विरोध और सवर्ण राजनीति रही है और वे जिस इलाके से आते हैं, वहां यादव राजनीति से उनका शाश्वत विरोध है। 

Himanshu लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली।Mon, 2 Oct 2023 12:32 PM
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'ठाकुर के कुएं' से किसे मिलेगा मीठा पानी और किसकी राजनीति होगी खारी, समझें समीकरण

सुशांत झा: बिहार की राजनीति में ठाकुर का कुआँ पर बवाल मचा हुआ है और कुछ लोग इसे 'ब्राह्मण बनाम राजपूत' की राजनीतिक लड़ाई से जोड़कर देख रहे हैं। हालाँकि लड़ाई का ये नैरेटिव जम नहीं पा रहा है, क्योंकि राजद सांसद मनोज झा को उनका अपना समुदाय ही नेता नहीं मानता है। मनोज झा ब्राह्मणों के वैसे ही नेता हैं जैसे मुख्तार अब्बास नकवी मुसलमानो के नेता हैं। राजद के राज्यसभा सांसद मनोज झा, अतिवादी कथित सेक्यूलर नैरेटिव और पेरियारवादी अंध-ब्राह्मण-विरोध के इर्दगिर्द खड़े रहे हैं— जिसका विरोध ढेर सारे ब्राह्मणों ने किया था, जब उन्होंने उदयनिधि स्टालिन के ‘सनातन को खत्म करो’ का समर्थन किया था। दूसरी बात ये कि उन्होंने कभी ब्राह्मणों या सवर्णों के मुद्दे पर न तो राजनीति की और न ही उन मुद्दों को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से उठाया जैसा कि बिहार में संजय झा या अन्य ब्राह्मण नेता करते रहे हैं।

हाँ, ठाकुर का कुआँ विवाद पर उनका विरोध करने वाले आनंद मोहन को ज़रूर अपनी जाति के एक हिस्से का समर्थन प्राप्त रहा और वे और उनका परिवार कई बार उस वोट बैंक की सहायता से सांसद भी बने। एक जमाने में तो उनकी पत्नी ने औरंगाबाद और वैशाली जाकर बिहार के सबसे बड़े राजपूत नेता सत्येंद्र नारायण सिंह के परिवार से आने वाले उम्मीदवार को हरा दिया था। आनंद मोहन का परिवार बिहार के अलग-अलग हिस्सों से विधानसभा और लोकसभा में पहुंचता रहा है जिसमें सहरसा, शिवहर, वैशाली और औरंगाबाद जिला शामिल है। इस मायने में उनकी एक अखिल बिहार के नेता की छवि भी बनती है। हालांकि वो छवि उन उनके आपराधिक कृत्यों में लिप्त होने से ब्रांड नहीं बन पाया, नहीं तो आनंद मोहन में वो संभावना थी कि वो एक जमाने में लालू को चुनौती देने वाले नेता बन गए थे— जब लालू अपने प्रचंड जनसमर्थन के साथ बिहार में दुबारा मुख्यमंत्री बन गए थे। आनंद मोहन और पप्पू यादव में वो ऊर्जा थी कि अगर वे सिर्फ संसदीय राजनीति करते और अपराध में लिप्त न होते तो बिहार में एक नक्षत्र की तरह उदीयमान होते।  

इतना ही नहीं, आनंद मोहन को सिर्फ राजपूतों का समर्थन नहीं है—सहरसा और कोसी प्रमंडल के लोगों से बात करिए तो वहाँ के ब्राह्मणों के मन में भी आनंद मोहन के प्रति सहानुभूति है क्योंकि लालू यादव के सत्तानशीं होने के बाद ब्राह्मणों पर हुए हमलों में आनंद मोहन ने ब्राह्मणों का खुलकर समर्थन किया था।

देखा जाए तो आनंद मोहन की राजनीति मंडल विरोध और सवर्ण राजनीति रही है और वे जिस इलाके से आते हैं, वहां यादव राजनीति से उनका शाश्वत विरोध है। लेकिन फिलहाल उनका परिवार राजद में है। बेटा राजद से विधायक है और पत्नी भी राजद में है। आनंद मोहन किस दल में है, इस पर संशय है। ऐसे सवाल उठता है कि आनंद मोहन ने फिर मनोज झा को क्यों आड़े हाथों लिया? बल्कि ऐसी प्रतिक्रिया क्यों दी, जो ध्रुवीकरण जैसी लगती है? 

दरअसल,आनंद मोहन ने एक तीर से कई निशाने साधे हैं। बिहार में राजपूतों का कोई सर्वमान्य नेता नहीं है। ज्यादातर राजपूतों के बड़े नेता राजद में थे और हैं। भाजपा में राजपूतों के नेता या तो किनारे हैं या बुजुर्ग हो गए हैं। वैसे भी आनंद मोहन आज से करीब ढाई दशक पूर्व बड़े राजपूत नेता बनकर उभरे थे जो रिक्त स्थान अभी तक खाली है। ‘ठाकुर का कुआँ’ की मदद से वे इस रिक्ति को भरने का प्रयास कर रहे हैं।

दूसरा, राजपूत वोटों का एक हिस्सा, बल्कि बड़ा राजद को मिलता रहा है। पहले जनता दल को भी मिलता था और ऐसा वीपी सिंह-चंद्रशेखर और उससे भी पहले से रहा है जब राजपूतों और कायस्थों की लॉबी महीन रूप से ब्राह्मण-भूमिहार के प्रतिपक्ष में रहती थी। ऐसे में जिस राजद में राजपूत मतों का एक हिस्सा जाता है, वहाँ आनंद मोहन राजपूतों का सबसे बड़ा नेता बनकर लालू परिवार से अपना बार्गेनिंग पॉवर बढ़ा रहे हैं जिसका अंदाजा लालू को भी है। इसलिए लालू ने उन्हें “अक्ल और शक्ल” देखने की नसीहत दे डाली। बिहार में जहां-जहां राजपूत सांसद जीत जाते हैं, उनमें से कई ऐसे श्रेत्र हैं जहां उनका मुकाबला यादवों से होता है- मसलन छपरा, बांका, पूर्णिया जैसे क्षेत्र भी शामिल हैं। ऐसे में यादव वर्चस्व वाली पार्टी में एक ध्रुवीकृत राजपूत वोट ही बेहतर मोलभाव कर ज्यादा संख्या में राजपूतों के लिए टिकट ले सकता है जिसकी आशा और जिसके नेतृत्व की कामना आनंद मोहन कर रहे हैं। ठाकुर का कुआं उनके लिए सुनहरा मौका बनकर आया है। 

दूसरी बात, बीजेपी में जब से योगी आदित्यनाथ का कद बढ़ा है और लोकप्रियता में लोग उन्हें पीएम मोदी का उत्ताराधिकारी तक मानने लगे हैं, ऐसे में राजपूत मतदाताओं का रुझान लगभग संपूर्ण रूप से बीजेपी की तरफ हो सकता है। कम से कम लोकसभा चुनाव में ऐसा हो सकता है। ऐसे में राजद के लिए जरूरी है कि वह राजपूतों का कुछ वोट हासिल करे जो उसका परंपरागत वोट भी रही है, क्योंकि सिर्फ यादव-मुस्लिम वोटबैंक उसे सत्ता से कई बार दूर कर चुकी है। आनंद मोहन का मनोज झा को लेकर हिंसक वक्तव्य एक उकसावा भरा बयान भी है कि इसकी प्रतिक्रिया में ब्राह्मण समाज भी उग्र वक्तव्य दे और उसका फायदा राजद को मिल जाए। लेकिन राजद समझती है कि राजद को इससे भले ही कुछ फायदा हो, ज्यादा फायदा आनंद मोहन की ‘राजपूत हृदय सम्राट’ वाली छवि को होगा और इस भस्मासुर को लालू एक सीमा से ज्यादा बढ़ने नहीं देना चाहते—इसलिए उन्होंने आनंद मोहन को लेकर ‘अक्ल और शक्ल’ की बात कही थी।
 
ऐसे में ठाकुर का कुआँ के मुद्दे पर कुछ लोगों का मत है कि इससे सवर्ण वोट बंटेगा और राजद को फायदा होगा। लेकिन दूसरा मत ये भी है कि चूँकि ब्राह्मणो ने इस पर कोई खास प्रतिक्रिया नहीं दी है, ऐसे में इस प्रकरण से राजद को मिल रहा रहा-सहा ठाकुर मत भी दूर हो सकता है और अगर यह मामला ज्यादा बढ़ा तो राजद के प्रति सहानुभूति दर्शा रही कुछ दलित और पिछड़ी जातियाँ भी राजद से नाराज होकर बीजेपी की तरह रुख कर सकती हैं। 

कुल मिलाकर ठाकुर का कुआं में हिलोर राजद पर भी भारी पड़ सकता है।

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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