पाकिस्तान में हिंदू और सिख की तरह सुविधा चाहें जैन, उठाई नेहरू-लियाकत समझौते में संशोधन की मांग
1950 में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के समकक्ष लियाकत अली खान ने समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इसके तहत एक-दूसरे के देश में अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करने की बात कही गई थी।

पाकिस्तान में धार्मिक स्थलों पर जाने में सुविधा के लिए अब जैन समुदाय ने भी सात दशक पुराने समझौते में बदलाव की मांग कर दी है। पड़ोसी मुल्क गए एक जैन प्रतिनिधि मंडल का कहना है कि नेहरू-लियाकत समझौते में संशोधन की जरूरत है। समुदाय हिंदू और सिख की तर्ज पर तीर्थयात्री वीजा मामले में सुविधाएं चाहता है। फिलहाल, जैन समुदाय का एक प्रतिनिधिमंडल पाकिस्तान में धार्मिक स्थलों पर पहुंचा है।
एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, जैन हेरिटेज फाउंडेशन के महासचिव अश्विनी जैन का कहना है कि जैन समुदाय और पाकिस्तान में उनके धार्मिक विरासत के बीच संबंध मजबूत करने के लिए कदम उठाए गए हैं। उन्होंने जानकारी दी कि 18 जैन तीर्थयात्री पाकिस्तान में हैं। उन्होंने बताया कि ये श्रद्धालु समझौते में बदलाव की जरूरत बता रहे हैं।
क्या है नेहरू-लियाकत समझौता
1950 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के समकक्ष लियाकत अली खान ने समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इसके तहत एक-दूसरे के देश में अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करने की बात कही गई थी। इस समझौते के प्रावधानों में यह बात भी शामिल थी कि भारत से हिंदू और सिख धार्मिक आयोजनों पर पाकिस्तान में तीर्थयात्रा कर सकेंगे। अश्विनी का कहना है कि इसमें जैन समुदाय के लिए कोई खास प्रावधान नहीं था।
समझौते में कहा गया था कि भारत और पाकिस्तान की सरकार इस बात पर सहमत है कि दोनों अपने क्षेत्रों में अल्पसंख्यकों को समानता और सुरक्षा सुनिश्चित करेंगे। साथ ही इसमें हर देश में आने जाने की आजादी, काम करने की आजादी और कानून के दायरे में बोलने और पूजा करने की आजादी होगी। नेहरू और लियाकत के बीच 8 अप्रैल 1950 को इस समझौते पर सहमति दी थी।
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