Why Iran irritated with Saudi Arabia and Israel friendship USA tried to solve Middle East problem - International news in Hindi सऊदी अरब और इजराइल की दोस्ती से क्यों चिढ़ रहा ईरान, दोनों देश क्या बना रहे प्लान?, International Hindi News - Hindustan
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सऊदी अरब और इजराइल की दोस्ती से क्यों चिढ़ रहा ईरान, दोनों देश क्या बना रहे प्लान?

सऊदी अरब 1932 में बना, जबकि इजरायल की स्थापना 1948 में हुई। फिलिस्तीन लिबरेशन संगठन ने 15 नवम्बर 1988 को अल्जीरिया के नेशनल असेम्बली की परिषद में स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य की घोषणा की थी।

Admin लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्लीWed, 27 Sep 2023 03:24 PM
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सऊदी अरब और इजराइल की दोस्ती से क्यों चिढ़ रहा ईरान, दोनों देश क्या बना रहे प्लान?

हाल ही में एक खबर ने पूरी दुनिया को अचंभे में डाल दिया कि लंबे समय से दुश्मन रहे दो नजदीकी पड़ोसी देश अब दोस्त बनने जा रहे हैं। उन दोनों के बीच दोस्ती की मध्यस्थता भी दुनिया का सबसे ताकतवर देश अमेरिका कर रहा है। जी हां, सऊदी अरब और इजरायल बदले भू-राजनीतिक परिदृश्य और वैश्विक रणनीति के तहत दोस्त बनने जा रहे हैं। खुद सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) ने इसकी पुष्टि की और कहा कि दोनों देशों के बीच बातचीत अंतिम दौर में है। MBS ने फॉक्स न्यूज को दिए एक इंटरव्यू में कहा था कि हर दिन हम करीब आ रहे हैं।

इजरायल और सउदी अरब दोनों ही पश्चिमी एशिया के देश हैं। दोनों के बीच महज 16 किलोमीटर की दूरी है और बीच में एक छोटा सा देश जॉर्डन है। बावजूद इसके दोनों के बीच दोस्ती होने में 72 साल लग गए। दरअसल, तीन साल पहले 2020 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में अब्राहम समझौता हुआ था। इसके तहत ये तय किया गया था कि इजरायल, बहरीन और संयुक्त अरब अमीरात अपने-अपने दूतावास एक-दूसरे के यहां स्थापित करेंगे और पर्यटन, व्यापार समेत सुरक्षा समेत कई क्षेत्रों मे सहयोग करेंगे।

जब इजरायल ने संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन के लिए विमान सेवा का रास्ता चाहा तो पेच फंस गया क्योंकि वह रास्ता सऊदी अरब होकर जाता था। तब इन देशों ने सऊदी अरब से मदद मांगी, जिस पर सऊदी तैयार हो गया और इजरायल एयरलाइन्स के लिए अपना आसमान खोल दिया।

तीन साल बाद फिर से एक और अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने उस अब्राहम समझौते को विस्तार देने, गाजा पट्टी में संबंधों को मजबूत करने और मिडिल ईस्ट में शांति स्थापित करने के इरादे से इजरायल और सऊदी अरब में दोस्ती करानी चाही है। दोनों देश इसके लिए तैयार हो गए हैं और बातचीत कर रहे हैं लेकिन ईरान इस दोस्ती से बिफर पड़ा है। ईरान और इजरायल के संबंध कभी बेहतर नहीं रहे। ईरान इजरायल को देश के रूप में मान्यता भी नहीं देता है। दूसरी तरफ इसी साल जून में ईरान ने सऊदी अरब में अपना दूतावास खोला था।

ईरान की ही तरह सऊदी अरब भी इजरायल को फिलिस्तीन विवाद की वजह से मान्यता नहीं देता था। इन दोनों देशों के बीच कोई राजनयिक संबंध नहीं है लेकिन बदलते परिदृश्य को पश्चिमी एशिया के लिए ऐतिहासिक और क्रांतिकारी बदलाव के तौर पर देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि ये बदलाव कुछ छिपी अंदरूनी शर्तों पर हो रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया है कि अमेरिका की पैरवी पर सऊदी अरब ने इजरायल से दोस्ती करने के बदले बड़ा सैन्य समर्थन और असैन्य परमाणु कार्यक्रम समेत फिलीस्तीन के लिए कई मांगें रखी हैं।

उधर, ईरान की नजर इस तिकड़म और दोस्ती की नई कहानी पर टिकी है। अभी हाल ही में ईरान के राष्ट्रपति संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करने न्यूयॉर्क पहुंचे थे। वहां उन्होंने अमेरिकी मीडिया को दिए इंटरव्यू में मध्य-पूर्व के देशों को इजरायल से दोस्ती करने में आगाह किया और कहा कि इजरायल के साथ रिश्ते सामान्य करने से क्षेत्रीय सुरक्षा और शांति नहीं आने वाली है। ईरान जहां इजरायल को मान्यता नहीं देता है, वहीं इजरायल कई बार कह चुका है कि वह परमाणु ताकत ईरान को भी बर्दाश्त नहीं करेगा।

ईरान ने कई बार आरोप लगाया है कि इजरायल ने न सिर्फ उसके परमाणु ठिकानों पर हमला करवाया है बल्कि उसके न्यूक्लियर साइंटिस्टों की भी हत्या करवाई है। उधर, इजरायल इन आरोपों का न तो खंडन करता है और न ही उसे स्वीकार करता है। उधर, सऊदी अरब इजरायल और फिलीस्तीन के झगड़े में फिलीस्तीन के पक्ष में खड़ा रहा है। ऐसे में संभावना जताई जा रही है कि सऊदी अरब के दबाव में इजरायल फिलीस्तीन से संबंध ठीक कर सकता है और विवाद खत्म हो सकता है। इससे गाजा पट्टी में शांति आ सकती है।

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