कामदुनी गैंगरेप केस में दोषियों को HC से राहत पर भड़के लोग; जोरदार प्रदर्शन, ममता सरकार को भी घेरा
यह जघन्य घटना तब हुई थी जब युवती परीक्षा देकर कॉलेज से लौट रही थी। घटना से राज्य में लोगों में आक्रोश भड़क गया था। मामले में एक स्थानीय अदालत ने 7 जून 2013 को तीन लोगों को मौत की सजा सुनाई।

कामदुनी गैंगरेप केस में दोषियों को कोलकाता हाई कोर्ट से मिली राहत का विरोध हो रहा है। उत्तर 24 परगना जिले के कामदुनी के वामपंथी, कांग्रेसी और दूसरे नेता उस वक्त एकसाथ नजर आए, जब उन्होंने मंगलवार को एचसी के 6 अक्टूबर के आदेश के विरोध में कोलकाता में जुलूस निकाला। अदालत ने 6 में से 3 की मौत की सजा को रद्द कर दिया है। ये सभी 2013 में एक गांव में 20 वर्षीय कॉलेज छात्रा के साथ सामूहिक बलात्कार और हत्या के दोषी पाए गए थे। भाजपा ने भी मंगलवार को कामदुनी में विरोध रैली निकाली जिसका नेतृत्व विधानसभा में विपक्ष के नेता सुवेंदु अधिकारी ने किया।
यह जघन्य घटना तब हुई थी जब युवती परीक्षा देकर कॉलेज से लौट रही थी। घटना से राज्य में लोगों में आक्रोश भड़क गया था। मामले में एक स्थानीय अदालत ने 7 जून 2013 को तीन लोगों को मौत की सजा और 3 अन्य को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। सत्र अदालत ने 2016 में अमीन अली, सैफुल अली और अंसार अली को मौत की सजा सुनाई थी। इनके अलावा इमानुल इस्लाम, अमीनुल इस्लाम और भोला नस्कर को आजीवन कारावास की सजा हुई। हालांकि, HC ने अमीन अली को बरी कर दिया और सैफुल अली व अंसार अली की मौत की सजा को पूरे जीवन के कारावास में बदल दिया।
जानें HC ने अपने फैसले में क्या कहा
अदालत ने दोनों को सामूहिक बलात्कार, दुष्कर्म के दौरान पीड़िता की मौत और हत्या का दोषी ठहराया। तीनों आरोपों में अलग-अलग आजीवन कारावास की सजा सुनाई। आपराधिक साजिश रचने और सबूत नष्ट करने को लेकर इन लोगों को 7 साल के कठोर कारावास की सजा भी सुनाई गई। अदालत ने निर्देश दिया कि सभी सजाएं साथ-साथ चलेंगी। जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस अजय कुमार गुप्ता की खंडपीठ ने इमानुल इस्लाम, अमीनुर इस्लाम और भोला नस्कर को गैंगरेप के आरोप से बरी कर दिया, लेकिन उन्हें आपराधिक साजिश रचने और सबूतों को नष्ट करने का दोषी ठहराया।
एचसी की ओर से कहा गया कि तीनों अपनी गिरफ्तारी के बाद से 10 साल से अधिक समय तक जेल में रह चुके हैं और उनकी दोषसिद्धि के लिए अधिकतम 7 साल की कैद का प्रावधान है। अदालत ने निर्देश दिया कि 10-10 हजार रुपये का जुर्माना अदा करने पर तीनों को रिहा कर दिया जाए। अगर वे जुर्माना नहीं भरते हैं तो उन्हें तीन और महीनों के लिए साधारण कारावास भुगतना होगा। खंडपीठ ने नूर अली और रफीकुल इस्लाम गाजी को बरी करने के निचली अदालत के फैसले को भी बरकरार रखा। एक अन्य आरोपी की सुनवाई के दौरान मौत हो गई थी।
SC में हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देगा पीड़ित परिवार
पीड़ित परिवार ने कहा है कि वे इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करेंगे। कामदुनी के टीचर प्रदीप मुखर्जी ने कहा, 'हमने दिल्ली में कुछ वकीलों से संपर्क किया है। हम हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए एक अलग याचिका दायर करेंगे।' राज्य के आपराधिक जांच विभाग (CID) ने इस मामले की जांच की थी, उसने भी उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देते हुए एससी का रुख किया है। विरोध प्रदर्शन में शामिल कामदुनी के लोगों ने तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) सरकार पर मामले को हल्के में लेने का आरोप लगाया। गौरतलब है कि देश को झकझोर देने वाली 2012 की दिल्ली घटना को ध्यान में रखते हुए केंद्र की ओर से नया बलात्कार विरोधी कानून लागू किया गया। इसके बाद बंगाल में बलात्कार के मामले में दी गई ये पहली मौत की सजा थी।
(एजेंसी इनपुट के साथ)
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