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मंदिर के फूलों से बना दुनिया का पहला ईको फ्रेंडली लेदर पर्स दिसंबर से बाजार में आएगा

कानपुर के अंकित अग्रवाल ने बनाई है मंदिरों से निकलने वाले फूलों से फ्लेदर बनाने की तकनीक, इसी फ्लेदर से तैयार होगा पर्स, नामी-गिरामी कंपनी टॉमी हिलफिगर व केल्विन क्लेन कर रही लांच।

Drigraj कानपुर। वरिष्ठ संवाददाता, Mon, 19 Sep 2022 07:13 AM
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मंदिर के फूलों से बना दुनिया का पहला ईको फ्रेंडली लेदर पर्स दिसंबर से बाजार में आएगा

दुनिया का पहला ईको फ्रेंड्ली लेदर पर्स दिसंबर से बाजार में धूम मचाएगा। कानपुर के युवा अंकित अग्रवाल द्वारा तैयार किए गए फ्लेदर से इसे बनाया गया है। ग्लोबल स्तर पर फैशन की नामी-गिरामी कंपनी टॉमी हिलफिगर व केल्विन क्लेन पर्स को लांच कर रही है। खास बात है कि यह फ्लेदर जानवर की खाल नहीं बल्कि मंदिरों में चढ़ने वाले फूलों से बनाया है।

इसकी गुणवत्ता व सॉफ्टनेस बिल्कुल शीप (भेड़) के लेदर की तरह है। अंकित ने बताया कि ट्रायल के रूप में लेडीज व जेंट्स के पर्स बनने भी लगे हैं। किदवई नगर निवासी अंकित ने पुणे के कॉलेज से बीटेक के बाद सिम्बॉयोसिस इंस्टीट्यूट ऑफ बिजनेस मैनेजमेंट से पढ़ाई की। आईआईटी कानपुर की मदद से स्टार्टअप स्थापित कर इनोवेशन में जुट गए।

दो साल तक कड़ी मेहनत के साथ अत्याधुनिक लैब में कई शोध किए और फिर फूलों के पोषण से बैक्टीरिया को विकसित कर फ्लेदर बनाने में सफलता हासिल की। पनकी इंडस्ट्रियल एरिया में एक फैक्ट्री लगाई है जहां बड़े व्यापक पैमाने पर फ्लेदर को विकसित किया जा रहा है। पेटा यानी पीपुल्स फॉर द एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनीमल ने सर्टिफिकेट दिया है तो आईआईआरटी (इंस्टीट्यूट फॉर इंडस्ट्रियल रिसर्च एंड टॉक्सीकोलॉजी) ने इस शोध पर मुहर लगाई है।

टेक्नोलॉजी को लेकर अंकित ने तीन पेटेंट भी कराए हैं। कंपनी के रिसर्च हेड नचिकेत ने बताया कि टॉमी हिलफिगर ने फ्लेदर को मंजूरी दे दी है और अपने मुताबिक डिजाइन विकसित कर उत्पाद बनाने की तैयारी कर रही है। कंपनी बड़े स्तर पर एक साथ उत्पाद लाना चाहती है।


पर्यावरण को नहीं करेगा नुकसान

नचिकेत ने बताया कि जानवरों से तैयार लेदर में सबसे ज्यादा मीथेन गैस उत्सर्जित होती है जिससे ग्लोबल वार्मिंग का खतरा बढ़ता है। वहीं फूलों से बना फ्लेदर पूरी तरह पर्यावरण के मुफीद है। लेदर मिट्टी के साथ हवा को भी प्रदूषित करता है। मगर फ्लेदर जब उपयोग लायक नहीं रहेगा, तो उसे मिट्टी में फेंकने के 90 दिन बाद वह पूरी तरह बायोडिग्रेड हो जाएगा।

अंकित ने बताया कि गंगा प्रदूषण मुक्त हो, इस बारे में सोचते-सोचते ही फूलों से उत्पाद बनाने का आइडिया आया था। मेरा एक दोस्त चेक गणराज्य से आया था। बैराज घूमने गए थे, जहां गंगा में फूलों को फेंका जा रहा था तभी गंगा में फूलों के कचरे से प्रदूषण कम करने को लेकर रिसर्च करने की सोची। फूलों को रीसाइकिल कर कई उत्पाद तैयार किए।

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