आस्था, शक्ति और साधना का पावन पर्व — चैत्र नवरात्रि!
मां दुर्गा की आराधना का पर्व है नवरात्र। वासंतिक नवरात्र के साथ ही हिंदू नव वर्ष का आरंभ भी होता है। चैत्र कृष्ण पक्ष अमावस्या के दिन हिन्दू वर्ष का समापन होता है और इसी के साथ चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा को नूतन वर्ष अर्थात नव संवत्सर प्रारम्भ होता है। चैत्र नवरात्र ग्रीष्म ऋतु का आगाज लेकर आते हैं। चैत्र माह में पड़ने के कारण इस नवरात्र को चैत्र कहा जाता है। साल में व्रत और उपवास वाले दो नवरात्रि आते हैं, पहला चैत्र मास के जो अप्रैल में रखे जाते हैं, दूसरे शारदीय नवरात्रि जो अक्टूबर-नवंबर में आते हैं। इन दोनों नवरात्र में साधक पूरे नौ दिनों तक उपवास रखकर फलाहार रहकर विधिवत पूजा अर्चना करते हैं। इसके अलावा साल में दो गुप्त नवरात्रि भी आते हैं, जिनमें महाकाली की 10 विधाओं की पूजा की जाती है। विशेष पूजा और अर्चना वाले चैत्र नवरात्रि पूरे नौ दिनों तक रखे जाते हैं। इसके बाद कन्या भोज के साथ माता रानी के व्रत का पारण किया जाएगा। इन नौ दिनों तक लगातार देवी माता के नौ स्वरूप -माता शैलपुत्री, माता ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री देवी की पूजा अर्चना की जाएगी। अष्टमी के व्रत के बाद रामनवमी पर कन्या भोज होता है। इसी दिन भगवान राम के जन्म के उपलक्ष्य में रामनवमी मनाई जाती है।
शुरू होने वाली चैत्र नवरात्रि इस वर्ष 30 मार्च 2025 से आरंभ होकर 7 अप्रैल 2025 को राम नवमी के साथ संपन्न होगी। यह पर्व देवी दुर्गा के नौ रूपों की आराधना, आत्मिक शुद्धि और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्ति का प्रतीक माना जाता है। नवरात्रि की शुरुआत घटस्थापना से होती है और प्रत्येक दिन देवी को विशेष भोग, रंग और पूजा विधि से समर्पित होता है। उपवासी सात्विक भोजन जैसे कुट्टू की पूड़ी, साबूदाना, समा के चावल और फलाहार ग्रहण करते हैं। अष्टमी या नवमी को कन्या पूजन कर मां का आशीर्वाद लिया जाता है। वैष्णो देवी, ज्वाला देवी और कामाख्या जैसे शक्तिपीठों में विशेष आयोजन होते हैं। नवरात्रि न केवल धार्मिक, बल्कि मानसिक और आत्मिक उन्नयन का भी श्रेष्ठ अवसर है।
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