'पुराने जज उदार थे, हम नहीं', Ex IPS पर क्यों भड़के SC जज? ठोक दिया तीन लाख का जुर्माना
सुनवाई के दौरान भट्ट की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता देवदत्त कामत ने दलील दी कि भट्ट ने केवल ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग की मांग की थी और यह कोई अपराध नहीं है। कामत ने तर्क दिया,"कुछ तो तर्क होना चाहिए।

पूर्व आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट द्वारा ड्रग प्लांटिंग मामले में बार-बार याचिका दायर करने पर सुप्रीम कोर्ट मंगलवार को भड़क उठा और पूर्व अधिकारी पर तीन लाख रुपये का जुर्माना ठोक दिया। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस राजेश बिंदल की खंडपीठ ने कहा कि भट्ट बार-बार याचिकाएं दायर कर रहे हैं, इसलिए उन पर दायर तीन याचिकाओं के लिए प्रत्येक पर एक लाख के जुर्माने के हिसाब से कुल तीव लाख रुपये का जुर्माना लगाया जाता है।
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस विक्रम नाथ ने Ex IPS अफसर पर जुर्माना लगाते हुए और याचिका खारिज करते हुए कहा, "आप कितनी बार सुप्रीम कोर्ट आए हैं? कम से कम एक दर्जन बार? पिछली बार जस्टिस गवई ने आप पर 10 हजार रुपये का जुर्माना लगाया था? इस बार 6 अंकों में यह आंकड़ा है। क्या आप अपनी याचिका वापस ले रहे हैं? जस्टिस गवई दयालु थे। हम नहीं।"
इसके साथ ही कोर्ट ने निर्देश दिया कि जुर्माने की राशि गुजरात हाई कोर्ट के अधिवक्ता संघ के पास जमा की जानी चाहिए। खंडपीठ इस साल 24 अगस्त को दिए गए गुजरात हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ पूर्व पुलिस अफसर की अपील पर सुनवाई कर रही थी। हाई कोर्ट ने पूर्व IPS अफसर के खिलाफ दायर ड्रग प्लांटिंग मामले की सुनवाई कर रहे ट्रायल कोर्ट के न्यायाधीश की निष्पक्षता के बारे में चिंता जताने वाले आवेदन को खारिज कर दिया था।
हाई कोर्ट के सिंगल जज बेंच के जस्टिस समीर दवे ने मुकदमे को स्थानांतरित करने की भट्ट की याचिका को भी खारिज कर दिया था और आदेश के प्रभाव पर रोक लगाने या मुकदमे की कार्यवाही पर एक महीने के लिए रोक लगाने से भी इनकार कर दिया था। इसके बाद भट्ट ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था और इस दौरान उन्होंने कई याचिकाएं दायर कर दीं।
वह आवेदन नारकोटिक्स, ड्रग्स और साइकोट्रोपिक सब्सटेंस एक्ट (एनडीपीएस अधिनियम) के तहत भट्ट के खिलाफ दर्ज मामले में मुकदमे की कार्यवाही के संचालन के संबंध में उनके द्वारा पहले दायर किए गए तीन आवेदनों को खारिज करने के ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए दायर किया गया था।
इन आवेदनों में भट्ट को ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही में वीडियोकांफ्रेंसिंग की पहुंच की अनुमति देने और अंतरिम आदेश में ट्रायल कोर्ट द्वारा की गई कुछ टिप्पणियों को सुधारने की दलीलें शामिल थीं। भट्ट ने दावा किया था कि इन आवेदनों को इस आधार पर खारिज कर दिया गया है कि ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही को स्थानांतरित करने की याचिका जैसी ही अन्य याचिकाएं हैं। भट्ट ने अपनी याचिका में ट्रायल जज की निष्पक्षता और निष्पक्षता के बारे में चिंता व्यक्त की थी।
यह मामला 1996 में राजस्थान के एक वकील की गिरफ्तारी से जुड़ा है। तब पालनपुर में एक होटल के कमरे से वकील के पास से ड्रग्स जब्त होने के बाद बासनकांठा पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया था। उस वक्त भट्ट बासनकांठा में पुलिस अधीक्षक थे। बाद में राजस्थान पुलिस ने दावा किया था कि भट्ट की टीम ने वकील पर झूठा मामला दर्ज किया था और ऐसा केवल संपत्ति विवाद के संबंध में वकील को परेशान करने के मकसद से किया गया था।
भट्ट को इस मामले में सितंबर 2018 में गिरफ्तार कर लिया गया था और तब से वह जेल में हैं। इसी साल फरवरी में, सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2023 के गुजरात उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देने वाली उनकी याचिका खारिज कर दी थी, जिसने मुकदमे को पूरा करने का समय 31 मार्च, 2023 तक बढ़ा दिया था। जस्टिस गवई ने तब याचिका को 'तुच्छ' बताया था और भट्ट पर ₹10,000 का जुर्माना लगाया था।
संजीव भट्ट को नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के मुखर आलोचक के रूप में जाना जाता है। सेवा से बर्खास्तगी से पहले, उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष एक हलफनामा दायर किया था जिसमें आरोप लगाया गया था कि 2002 के गुजरात दंगों में मोदी के नेतृत्व वाली गुजरात सरकार की मिलीभगत थी। उन्हें सेवा से अनधिकृत अनुपस्थिति के आधार पर 2015 में केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा बर्खास्त कर दिया गया था।
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