कोयला घोटाले में मनमोहन सिंह को करना पड़ा आरोपों का सामना, जानें कोर्ट से कैसे मिली थी राहत
- सुप्रीम कोर्ट में दायर मनमोहन सिंह की अपील में निचली अदालत के मार्च 2015 के आदेश को चुनौती दी गई, जिसमें हिंडाल्को को तालाबीरा-2 कोयला खदान के आवंटन में कथित अनियमितताओं में उन्हें आरोपी के रूप में तलब किया गया था।
पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का राजनीतिक, सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन बेदाग रहा। सभी वर्गों के बीच उन्हें अत्यंत सम्मान की दृष्टि से देखा गया। लेकिन, उन्हें उस समय अदालती कार्यवाही से दो चार होना पड़ा जब उन्हें कोयला खदान आवंटन मामले में आरोपी के रूप में तलब किया गया। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप किया और उन्हें तलब किए जाने के निर्देश पर रोक लगा दी। कुशल अर्थशास्त्री और सम्मानित राजनीतिज्ञ सिंह ने उनके जैसे सार्वजनिक अधिकारियों पर मुकदमा चलाने के लिए अनिवार्य मंजूरी के अभाव पर सवाल उठाया। साथ ही, कोयला खदान आवंटन से संबंधित अपने निर्णय में किसी भी प्रकार के अपराध से इनकार किया।
सुप्रीम कोर्ट में दायर उनकी अपील में निचली अदालत के मार्च 2015 के आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें हिंडाल्को को तालाबीरा-2 कोयला खदान के आवंटन में कथित अनियमितताओं में उन्हें आरोपी के रूप में तलब किया गया था। अपील में कहा गया, ‘याचिका में कानूनी तौर पर महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए गए हैं। इसके लिए न्यायालय से सरकारी कार्यों और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत आपराधिक अभियोजन के बीच परस्पर संबंध के सिलसिले में आधिकारिक निर्णय की आवश्यकता है। विशेषकर ऐसे मामलों में जहां किसी प्रकार के लेनदेन का आरोप तो दूर की बात है, इसकी जरा भी भनक तक नहीं होती और मामला सरकारी निर्णयों की प्रक्रिया पर आधारित होता है।’
8 अप्रैल 2015 को मनमोहन सिंह हुए तलब
निचली अदालत के जज भरत पाराशर ने 11 मार्च 2015 को सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट को खारिज कर दिया था। उसी साल 8 अप्रैल को मनमोहन सिंह और अन्य को आरोपी के रूप में तलब किया था। जब कथित घोटाला हुआ था, उस समय पूर्व प्रधानमंत्री के पास अन्य मंत्रालयों के अलावा कोयला मंत्रालय भी था। न्यायाधीश पाराशर ने 2017 में कहा था कि सिंह के पास यह मानने का कोई कारण नहीं था कि तत्कालीन कोयला सचिव एचसी गुप्ता ने मध्य प्रदेश में कोयला खदान के आवंटन के लिए गैर-अनुपालन वाली निजी फर्म की सिफारिश की थी। गुप्ता को पूर्व प्रधानमंत्री के समक्ष बेईमानी से गलत बयानी करके अनियमितता बरतने का दोषी ठहराया गया था। यह पाया गया था कि पीएम ने केवल गुप्ता की अध्यक्षता वाली जांच समिति की सिफारिशों पर ही कार्य किया था।
मनमोहन सिंह के पास था कोयला मंत्रालय का प्रभार
अदालत ने कहा कि मनमोहन सिंह के पास यह मानने का कोई कारण नहीं था कि दिशानिर्देशों का पालन नहीं किया गया है। न्यायाधीश ने कहा, 'यह तथ्य कि देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कोयला मंत्रालय का प्रभार अपने पास ही रखना उचित समझा, यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि उक्त मंत्रालय का कार्य कितना महत्वपूर्ण था।' अदालत ने आगे कहा कि यह स्पष्ट है कि सिंह ने जांच समिति की सिफारिश पर इस धारणा के आधार पर विचार किया कि आवेदनों की पात्रता और पूर्णता की कोयला मंत्रालय में जांच की गई होगी। जांच समिति की सिफारिश पर फाइल को कोयला मंत्री के रूप में प्रधानमंत्री के पास भेजते समय (गुप्ता की तो बात ही छोड़िए) मंत्रालय के किसी भी अधिकारी ने यह नहीं कहा कि आवेदनों की पात्रता और पूर्णता की जांच नहीं की गई है।