भारत के पड़ोसी देशों ने बनाया त्रिगुट तो बौखला उठा अमेरिका; पुतिन-शेख हसीना की दोस्ती से क्यों लगी मिर्ची?
Bangladesh US Relations: सत्तारूढ़ अवामी लीग ने आरोप लगाया है कि अमेरिकी शह पर बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी और उसके इस्लामवादी सहयोगी सरकार के खिलाफ हिंसक विरोध प्रदर्शन और नाकेबंदी कर रहे हैं।

अगले महीने के पहले हफ्ते में बांग्लादेश में संसदीय चुनाव होने हैं लेकिन उससे पहले बांग्लादेश की सत्तारूढ़ अवामी लीग ने अमेरिका पर इन चुनावों में धांधली करवाने की कोशिश का आरोप लगाया है। इसमें प्रधानमंत्री शेख हसीना के विरोधियों द्वारा हिंसक विरोध प्रदर्शन का मौन समर्थन देने के भी आरोप शामिल हैं। बांगलादेश की सत्तारूढ़ पार्टी के एक वरिष्ठ सलाहकार के मुताबिक, प्रधान मंत्री शेख हसीना के नेतृत्व में रूस के साथ-साथ चीन संग बांग्लादेश के बढ़ते संबंधों से अमेरिका घबरा गया है।
अवामी लीग की अंतर्राष्ट्रीय मामलों की उप-समिति के अध्यक्ष और पूर्व विदेश सचिव, राजदूत मुहम्मद ज़मीर ने कहा कि रूसी विदेश मंत्रालय ने यह कहते हुए एक "बहुत वैध मुद्दा" उठाया है कि अमेरिका "अरब स्प्रिंग" जैसा विरोध प्रदर्शन भड़का सकता है। दरअसल, रूसी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता मारिया ज़खारोवा ने एक बयान में चेतावनी दी है कि अगर अमेरिका 6 जनवरी को बांग्लादेश के संघीय चुनाव के नतीजे से "संतुष्ट" नहीं हुआ तो वह अरब स्प्रिंग जैसे विरोध प्रदर्शन शुरू करने की कोशिश कर सकता है।
रूस ने भी जताई चिंता
मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया है कि रूसी अधिकारी ने भी चिंता व्यक्त की है कि बांग्लादेश में विपक्ष दल द्वारा बड़े पैमाने पर राजनीति से प्रेरित आगजनी ढाका में अमेरिकी राजदूत पीटर हास के उकसावे पर की गई है। रूसी विदेश मंत्रालय के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए, बांग्लादेश के विदेश मंत्री एके अब्दुल मोमेन ने कहा कि वह "महाशक्तियों के बीच तनाव में नहीं घसीटा जाना" चाहते हैं। मोमेन ने रविवार को एक सम्मेलन में कहा था कि बांग्लादेश अपनी "संतुलित विदेश नीति" के साथ आगे बढ़ रहा है और बढ़ता रहेगा। मोमेन ने कहा, "सभी के प्रति मित्रता, किसी के प्रति द्वेष नहीं रखना बांग्लादेश की विदेश नीति की नींव रही है।"
शेख हसीना के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन
सत्तारूढ़ अवामी लीग ने आरोप लगाया है कि अमेरिकी शह पर बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) और उसके इस्लामवादी सहयोगी सरकार के खिलाफ हिंसक विरोध प्रदर्शन और नाकेबंदी कर रहे हैं, जिसमें मांग की गई है कि मतदान से पहले शेख हसीना प्रधानमंत्री पद छोड़ दें और एक "कार्यवाहक सरकार" बनाई जाए। बीएनपी ने वोट के बहिष्कार की भी घोषणा की है और कई निर्वाचन क्षेत्रों से अपने उम्मीदवार वापस ले लिए हैं।
रूस ने चेताया
इस बीच, रूसी विदेश मंत्रालय ने साफ तौर पर आगाह किया है और कहा है कि जैसे अमेरिका में पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की चुनावी हार के बाद कैपिटल हिल में 6 जनवरी 2021 में दंगे हुए थे, उसी तरह के दंगे ढाका में भी हो सकते हैं। हालाँकि, मॉस्को ने वाशिंगटन से यह समझने का आह्वान किया है कि बांग्लादेश में चुनाव निर्वाचनआयोग द्वारा आयोजित किया जा रहा है, न कि किसी पार्टी द्वारा।
बांग्लादेश पर अमेरिका की भौहें क्यों तनी?
दरअसल, शेख हसीना के नेतृत्व में रूस-बांग्लादेश संबंध प्रगाढ़ हुए हैं। सितंबर में पहली बार रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने ढाका की पहली यात्रा की। 1971 में बांग्लादेश की स्वतंत्रता मिलने के बाद यह किसी रूसी विदेश मंत्री की पहली यात्रा थी। इसके अगले ही महीने अक्टूबर में, बांग्लादेश को रूपपुर परमाणु ऊर्जा संयंत्र को बिजली देने के लिए रूसी ईंधन की पहली खेप प्राप्त हुई, जिसे मॉस्को की सहायता से बनाया जा रहा है।
रूपपुर परमाणु ऊर्जा संयंत्र बांग्लादेश के इतिहास में पहला नागरिक परमाणु संयंत्र है। 12.6 अरब डॉलर की इस परियोजना की 90 प्रतिशत फंडिंग रूस कर रहा है। इतना ही नहीं, नवंबर में रूसी नौसेना के प्रशांत बेड़े के स्क्वाड्रन ने बांग्लादेश के चटग्राम बंदरगाह का दौरा किया, जो 50 से अधिक वर्षों में इस तरह की पहली यात्रा थी।
इसी समय, चीन के साथ बांग्लादेश की भी आर्थिक साझेदारी बढ़ी है। बीजिंग ढाका के सबसे बड़े व्यापारिक भागीदार के रूप में उभरा है। राष्ट्रपति शी जिनपिंग की 2016 की ढाका यात्रा के दौरान ही बांग्लादेश बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव में शामिल हुआ। इस बीच, भारत का बांग्लादेश से संबंध मधुर बना रहा और दोनों देशों ने निकटतम राजनीतिक और विकासात्मक भागीदार के रूप में अपनी भूमिका बरकरार रखी है।
उधर, अमेरिका जो हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बांग्लादेश को शामिल करना चाहता था, नहीं कर सका। अपनी "संतुलित विदेश नीति" के अनुरूप, बांग्लादेश क्वाड समूह में भी शामिल होने से दूर रहा। ऐसे में अमेरिका अब बांग्लादेश को चीन और रूस के सहयोगी और अपने प्रतिकार के रूप में उसे देख रहा है, जबकि यह अमेरिका का प्रमुख रणनीतिक देश रहा है।
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