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कौन थीं गीता मुखर्जी, जिन्हें महिला आरक्षण आंदोलन की योद्धा बता रही है भाजपा

Women Reservation Bill History: गीता मुखर्जी महिलाओं के अधिकार के लिए लड़ने वाली एक संकल्पित महिला थीं। वह 1980 से 2000 तक पश्चिम बंगाल की पंसकुरा सीट से सात बार सीपीआई की सांसद चुनी गई थीं।

Pramod Kumar लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्लीWed, 20 Sep 2023 03:41 PM
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कौन थीं गीता मुखर्जी, जिन्हें महिला आरक्षण आंदोलन की योद्धा बता रही है भाजपा

Women Reservation Bill History and Geeta Mukherjee:  महिला आरक्षण बिल पर लोकसभा में आज चर्चा के दौरान कांग्रेस और बीजेपी के बीच न सिर्फ इसका श्रेय लेने की होड़ देखने को मिली बल्कि तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा ने ममता बनर्जी को महिला आरक्षण की माता करार दे दिया। इसी बीच गीता मुखर्जी का भी नाम गूंजा। इससे पहले सोनिया गांधी ने कहा कि यह बिल उनके जीवनसाथी राजीव गांधी का सपना और उनकी जिंदगी का मार्मिक क्षण है। इसकी काट में बीजेपी के निशिकांत दुबे ने गीता मुखर्जी और सुषमा स्वराज का नाम लिया।

क्या है महिला आरक्षण का इतिहास
दरअसल, पूर्व प्रधान मंत्री राजीव गांधी ने ही मई 1989 में सबसे पहले ग्रामीण और शहरी स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए एक तिहाई आरक्षण देने के लिए संविधान संशोधन विधेयक पेश किया था और इसके जरिए पहली बार उन्होंने निर्वाचित निकायों में महिला आरक्षण का बीज बोया था। हालांकि, विधेयक लोकसभा में पारित हो गया लेकिन सितंबर 1989 में राज्यसभा में पारित नहीं हो सका।

पीवी नरसिम्हा राव के काल में बिल हुआ पास
1992 और 1993 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव ने संविधान संशोधन विधेयक 72 और 73 को फिर से पेश किया। इसके जरिए ग्रामीण और शहरी स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए सभी पदों पर एक तिहाई (33%) आरक्षण लागू किया गया। इसका असर यह हुआ कि अब देश भर में पंचायतों और नगर पालिकाओं में लगभग 15 लाख निर्वाचित महिला प्रतिनिधि हैं।

देवगौड़ा का क्या योगदान
12 सितंबर, 1996 को तत्कालीन प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा के नेतृत्व वाली संयुक्त मोर्चा सरकार ने पहली बार महिला आरक्षण बिल 81वें संविधान संशोधन विधेयक के रूप में लोकसभा में पेश किया। विधेयक को लोकसभा में मंजूरी नहीं मिली। लालू-मुलायम और शरद यादव जैसे नेताओं ने इसका जबर्दस्त विरोध किया। बीजेपी के भी कुछ सांसदों ने विरोध किया। इसके बाद बिल को गीता मुखर्जी की अध्यक्षता वाली संयुक्त संसदीय समिति के पास भेज दिया गया। गीता मुखर्जी समिति ने दिसंबर 1996 में अपनी रिपोर्ट पेश की जिसमें कुल सात सिफारिशें की गई थीं। हालांकि, लोकसभा के विघटन के साथ विधेयक समाप्त हो गया।

दो साल बाद, अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने 1998 में 12वीं लोकसभा में महिला आरक्षण विधेयक को आगे बढ़ाया। हालांकि, इस बार भी विधेयक संसद से पारित नहीं हो सका।  इसे 1999, 2002 और 2003 में भी वाजपेयी सरकार के कार्यकाल में पेश किया गया, लेकिन सफलता नहीं मिल सकी।

कौन थीं गीता मुखर्जी?
गीता मुखर्जी महिलाओं के अधिकार के लिए लड़ने वाली एक संकल्पित महिला थीं। वह 1980 से 2000 तक पश्चिम बंगाल की पंसकुरा सीट से सात बार सीपीआई की सांसद चुनी गई थीं। इससे पहले वह 1967 से 1977 तक पश्चिम बंगाल विधानसभा की सदस्य भी रह चुकी थीं। महिला आरक्षण विधेयक का मसौदा तैयार करने में गीता मुखर्जी की अहम भूमिका थी। उन्हें इस बिल का मुख्य सूत्रधार माना जाता है।

क्या थीं उनकी सिफारिशें
गीता मुखर्जी की अध्यक्षता में संयुक्त संसदीय समिति ने 1996 के महिला आरक्षण विधेयक की जांच की और उससे जुड़ी सात सिफारिशें पेश की थीं। इनमें से पांच को 2008 के महिला आरक्षण बिल में शामिल किया गया था। ये सिफारिशें हैं (i) 15 वर्ष की अवधि के लिए आरक्षण; (ii) एंग्लो इंडियंस के लिए उप-आरक्षण; (iii) उन मामलों में भी आरक्षण  का प्रावधान जिस राज्य में लोकसभा में तीन से कम सीटें हैं (या एससी/एसटी के लिए तीन से कम सीटें हैं); (iv) दिल्ली विधानसभा के लिए आरक्षण; और (v) "एक तिहाई से कम नहीं" शब्दावली को "जितना संभव हो सके, एक तिहाई" आरक्षण शब्दावली के रूप में बदलना।

ये दो सिफारिशें नहीं अपनाई गई
सरकार ने दो सिफ़ारिशों को 2008 के विधेयक में शामिल नहीं किया था। उनमें- पहला राज्यसभा और विधान परिषदों में सीटें आरक्षित करना है और दूसरा, संविधान द्वारा ओबीसी को आरक्षण देने के बाद ओबीसी महिलाओं के लिए भी कोटा देना शामिल है। हालांकि, कानून और न्याय संबंधी स्थायी समिति अपनी अंतिम रिपोर्ट में आम सहमति तक पहुंचने में विफल रही थी। समिति ने अनुशंसा की थी कि विधेयक को संसद में पारित किया जाए और बिना किसी देरी के अमल में लाया जाए। 

तब समिति के दो सदस्यों, वीरेंद्र भाटिया और शैलेन्द्र कुमार (दोनों समाजवादी पार्टी से संबंधित) ने यह कहते हुए असहमति जताई थी कि वे महिलाओं को आरक्षण देने के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन जिस तरह से इस विधेयक का मसौदा तैयार किया गया है, उससे वे सहमत नहीं हैं। उनकी तीन सिफारिशें थीं: (i) प्रत्येक राजनीतिक दल को अपना 20% टिकट महिलाओं को देने चाहिए; (ii) वर्तमान स्वरूप में भी आरक्षण 20% सीटों से अधिक नहीं होना चाहिए; और (iii) ओबीसी और अल्पसंख्यक महिलाओं के लिए उसी प्रस्तावित आरक्षण में कोटा होना चाहिए। 

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