छत्तीसगढ़ में खत्म हुआ 36 का आंकड़ा, राजस्थान में कैसे निपटेगी कांग्रेस; कितने पर राजी होंगे सचिन पायलट
मुख्यमंत्री बनने की चाह में बागी तेवर अपनाकर सचिन पायलट पहले ही डिप्टी सीएम और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद का त्याग कर चुके हैं। ऐसे में वह कहां जाकर राजी होंगे, यह कहना मुश्किल है।

कांग्रेस ने छत्तीसगढ़ में चुनाव से कुछ महीने पहले ही टीएस सिंह देव को डिप्टी सीएम बना दिया है। इसके बाद राज्य में खींचतान थमती दिख रही है और खुद टीएस सिंह देव ने कहा है कि राज्य में सीएम पद पर रोटेशन जैसी कोई बात नहीं हुई थी। पहले इसकी काफी चर्चा थी कि ढाई साल भूपेश बघेल और फिर इतना ही टीएस सिंह देव को मिलने का समझौता हुआ था। अब जबकि टीएस सिंह देव ने ही ऐसे किसी करार की बात को खारिज कर दिया है तो मसला सुलझा दिख रहा है। अब चर्चा है कि राजस्थान में अशोक गहलोत बनाम सचिन पायलट की लड़ाई में फंसी कांग्रेस क्या फॉर्म्यूला निकालेगी। हालांकि यह छत्तीसगढ़ की तरह राजस्थान में दोनों नेताओं के बीच छत्तीस का आंकड़ा खत्म करना आसान नहीं है।
मुख्यमंत्री बनने की चाह में बागी तेवर अपनाकर सचिन पायलट पहले ही डिप्टी सीएम और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद का त्याग कर चुके हैं। ऐसे में वह कहां जाकर राजी होंगे, यह कहना मुश्किल है। छत्तीसगढ़ और एमपी के साथ ही राजस्थान में भी चुनाव होने हैं और पार्टी चाहती है कि उससे पहले सारे मसले सुलझा लिए जाएं। खासतौर पर कई जिलों में अध्यक्ष सचिन बनाम अशोक गहलोत के बीच फंसे हैं। इस तरह सरकार से लेकर संगठन तक दोफाड़ की स्थिति है और एकजुटता के बिना भाजपा का मुकाबला करना मुश्किल होगा। राजस्थान का मसला इसलिए भी अलग है क्योंकि पायलट और गहलोत के बीच कड़वाहट छत्तीसगढ़ के मुकाबले कहीं ज्यादा है।
पायलट और गहलोत के लिए लड़ाई में लौटना अब आसान नहीं
सचिन पायलट को नकारा, निकम्मा और गद्दार जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर चुके अशोक गहलोत लड़ाई को उस हद तक ले जा चुके हैं, जहां से लौटना आसान नहीं है। वहीं सचिन पायलट भी गहलोत पर हमला बोलते हुए कह चुके हैं कि उनकी नेता शायद सोनिया गांधी नहीं बल्कि वसुंधरा राजे हैं। इसके अलावा सचिन पायलट ने कभी भी खुद को राजस्थान की सरकार में नंबर दो बनाने या बड़े मंत्रालय दिए जाने की मांग नहीं की। उनकी सीधी मांग सीएम के तौर पर नेतृत्व की रही है। वह मानते हैं कि एक विधायक के तौर पर वह सत्ता का समानांतर केंद्र हैं, लेकिन सरकार में गहलोत के मातहत काम करने से उनका कद घटेगा।
CM पद से कम कुछ भी क्यों चाहते सचिन पायलट
पायलट की टीस रही है कि उन्होंने 2018 में प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर नेतृत्व किया था और जीत का क्रेडिट उन्हें सीएम बनाकर दिया जाना चाहिए था। उनकी तब से ही लड़ाई चली आ रही है और वह सीएम से कम किसी पद पर समझौते को तैयार नहीं दिखते। एक ही संभावना है कि सचिन पायलट समझौते के तौर पर अपने किसी करीबी को डिप्टी सीएम बनवा दें और बड़ी संख्या में अपने समर्थकों के लिए टिकट भी लें। हालांकि इसके लिए भी कांग्रेस को लंबी माथापच्ची करनी होगी। चुनाव से ठीक पहले उम्मीदवारों तक के चयन में गुटबाजी पार्टी को सीधे तौर पर नुकसान में डालेगी।
क्या पायलट की लीडरशिप में चुनाव को तैयार होंगे गहलोत?
एक चर्चा यह भी है कि चुनाव से पहले सचिन पायलट को प्रदेश अध्यक्ष का जिम्मा मिल जाए और उन्हें कांग्रेस वर्किंग कमेटी में भी जगह मिले। यही नहीं चुनाव समिति के अध्यक्ष का काम भी उनको मिल सकता है। लेकिन अशोक गहलोत इस पर कितना राजी होंगे, यह भी अहम सवाल है। प्रदेश अध्यक्ष या फिर चुनाव समिति के अध्यक्ष के तौर पर कमान पायलट के हाथ होगी और उनके मातहत गहलोत चुनाव में नहीं जाना चाहेंगे।
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