दिल्ली हाई कोर्ट ने नाबालिग से रेप के दोषी को किया बरी, अदालत ने वजह भी बताई
- दिल्ली हाई कोर्ट ने एक नाबालिग लड़की से रेप करने के दोषी को रिहा कर दिया। मामले को लेकर कोर्ट ने कहा कि दोनों के बीच समहति से संबंध बने थे। पूरा मामला क्या है…
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दिल्ली हाई कोर्ट ने नाबालिग लड़की के साथ रेप मामले में एक व्यक्ति को बरी कर दिया। दोषी व्यक्ति को बरी करते हुए कोर्ट ने कहा कि यह किशोरावस्था में प्यार का मामला था और उनके बीच शारीरिक संबंध सहमति से बने थे। इस मामले में न्यायमूर्ति जसमीत सिंह ने दोषी की दोषसिद्धि को खारिज कर दिया। आरोपी, 2014 में घटना के समय 19 साल का था और उस पर 17 वर्षीय लड़की के साथ बलात्कार करने का आरोप था।
अदालत ने बताई बरी करने की वजह
अदालत ने 20 फरवरी को कहा, ‘‘यह बात नजरअंदाज नहीं की जा सकती कि घटना के समय अपीलकर्ता (व्यक्ति) की आयु 19 वर्ष थी और अभियोक्ता (लड़की) की आयु लगभग 17 वर्ष थी। इस प्रकार, यह किशोरावस्था में प्यार का मामला था और शारीरिक संबंध सहमति से बने थे। इसलिए, पॉक्सो अधिनियम के तहत अपीलकर्ता को दोषी ठहराना न्याय की विकृति होगी।
अदालत ने कहा कि वयस्क होने की निर्धारित उम्र को उस कानून के संदर्भ में समझा जाना चाहिए और उसकी व्याख्या की जानी चाहिए, जिसके लिए इस पर विचार किया जा रहा है। उसने लड़की के विचार को इस आधार पर खारिज करना अनुचित पाया कि वह 18 वर्ष से कम उम्र की थी, जबकि उसकी राय और इच्छा ‘निश्चित और अडिग’ थी।
जेल से व्यक्ति की रिहाई का निर्देश देते हुए, हाई कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष लड़की की उम्र को साबित करने में असमर्थ रहा और संदेह का लाभ अपीलकर्ता को मिला। लड़की के पिता ने 2014 में गुमशुदगी की शिकायत दर्ज कराई थी और बाद में वह गाजियाबाद के एक व्यक्ति के साथ मिली। उसने मंदिर में शादी करने और गाजियाबाद में किराए के मकान में रहने का खुलासा किया। उसने व्यक्ति के साथ सहमति से शारीरिक संबंध बनाने का दावा किया।
इस मामले में एक निचली अदालत ने व्यक्ति को यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम के तहत सात साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई। दोषी ने अपनी दोषसिद्धि को चुनौती देते हुए कहा कि निचली अदालत ने यह समझने में गलती की कि लड़की की हर कृत्य में सहमति थी और ऐसा कुछ भी नहीं था जो यह दर्शाता हो कि यह यौन उत्पीड़न का मामला था।
हाई कोर्ट ने किशोरावस्था में प्रेम से जुड़े आपराधिक मामलों में सजा के बजाय समझ को प्राथमिकता देने वाले एक दयालु दृष्टिकोण की वकालत की, और कहा कि कानून में ऐसे रिश्तों को स्वीकार किया जाना चाहिए जो सहमति से बने हों और जबरदस्ती से मुक्त हों।