बोले आजमगढ़ : पहलवानों को दूर से आने में असुविधा, मिले छात्रावास की सुविधा
Azamgarh News - आजमगढ़ में महिला पहलवानों को कुश्ती में आगे बढ़ने के लिए कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। उन्हें बेहतर प्रशिक्षण और सुविधाओं की कमी का सामना करना पड़ रहा है। सुखदेव पहलवान स्टेडियम में छात्रावास...

आजमगढ़ जनपद अपने दंगल केसरियों के लिए जाना जाता रहा है। यहां की मिट्टी में पहलवानी का जुनून है। यही वजह है कि यहां सुखदेव पहलवान के नाम पर स्टेडियम का निर्माण कराया गया। यह बात दीगर है कि यहां नवोदित रेसलरों के लिए सुविधाएं नाम मात्र की हैं। एक छोटे से हॉल में एक मैट पर दर्जनों पहलवानों को एक समयसीमा के भीतर ही दांव-पेच आजमाने की अनुमति है। इसके लिए महिला पहलवानों को दस से बीस किमी तक साइकिल चलाकर आना पड़ता है। छात्रावास तो स्टेडियम के लिए 20 वर्ष पहले बन गया, अब तक हैंडओवर नहीं हो सका। सुखदेव पहलवान स्टेडियम में ‘हिन्दुस्तान से बातचीत में प्रीती यादव ने बताया कि नीबी में घर के समीप स्थित अखाड़े में कुछ लड़कियां आती हैं, लेकिन अभ्यास का मौका नहीं मिल पाता है। अभी कक्षा दस में ही हूं। अगर सुखदेव पहलवान स्टेडियम में छात्रावास की सुविधा मिल जाए तो हम जैसी महिला पहलवानों को आगे बढ़ने का मौका मिल जाएगा। छात्रावास में रहने से एक तरफ जहां बेहतर ढंग से नियमित अभ्यास हो सकेगा, वहीं हर दिन घर से आने-जाने की झंझट खत्म हो जाएगी। हमारे परिवार के लोग लगातार प्रोत्साहित करते हैं, लेकिन उम्र कम होने के कारण घर से स्टेडियम तक साइकिल चलाकर आने की अनुमति देने में संकोच करते हैं। गांव के अखाड़े में सुविधा नहीं मिल पाने से परेशानी होती है। कभी-कभी ही प्रतियोगिताओं में भाग लेने का मौका मिल जाता है।
सेना, सीआरपीएफ और पुलिस में जाने की तैयारी
नवोदित महिला पहलवान अनुपमा ने बताया कि वह सेना, सीआरपीएफ या पुलिस में जाना चाहती हैं। उनके गांव की कई लड़कियां कुश्ती के बल पर फोर्स और अन्य सरकारी सेवाओं से जुड़ी हैं। ये देखकर परिवार के लोग भी कुश्ती के खेल में आगे बढ़ाना चाहते हैं। इसके लिए बहुत ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है। हर दिन करीब दस किमी साइकिल चलाकर स्टेडियम आते हैं। अभ्यास के बाद फिर इतनी ही दूरी तय कर घर पहुंचते हैं।
चोट के कारण लखनऊ स्टेडियम से हुई वापसी
रंजनलता ने बताया कि वह तीन वर्षों तक लखनऊ स्थित साई हॉस्टल में रही थीं। कुश्ती के क्षेत्र में आगे बढ़ने का सपना लेकर वह लखनऊ में थीं, लेकिन चोट लगने से लौटकर घर आना पड़ गया। अब नीबी से 12 किमी दूर स्टेडियम में आकर कुश्ती के दांव-पेच सीख रही हूं। विनेश फोगाट और अन्य सफल पहलवानों के साथ रही थी, लेकिन घर लौटने के बाद अब सुविधाओं की कमी से जूझ रही हूं।
हर दिन 36 किमी साइकिल चलाने की मजबूरी
कंचन ने बताया कि वह हर दिन साइकिल से सठियांव ब्लॉक के कस्बा सराय से करीब 18 किमी दूर सुखदेव पहलवान स्टेडियम आती हैं।
ज्यादा समय आने-जाने में ही बीत जाता है। फिर भी सीखने के जुनून के चलते वह हर दिन स्टेडियम में आती हैं। पांच बहन और दो भाई हैं। पिता का निधन हो चुका है। कुश्ती में चुस्त-दुरुस्त रहने के लिए जो खुराक चाहिए, उसकी व्यवस्था करना मुश्किल होता है। एक उम्मीद है कि कुश्ती के बल पर फोर्स या रेलवे में नौकरी मिल जाने पर आर्थिक दिक्कतों से छूटकारा मिल जाएगा। सम्मानजनक जीवन जीने का अवसर मिलेगा।
लड़कियां कुश्ती में आगे बढ़ने के लिए लालायित
जया विश्वकर्मा ने बताया कि वह बम्हौर में रहती हैं और चार बहन व एक भाई के बीच दूसरे नंबर की है। बीए की पढ़ाई के साथ ही कुश्ती के दांव-पेच सीख रही हैं। घर में पांच गाय और भैंस हैं। उनकी भी देखभाल करनी पड़ती है। कुश्ती में आगे बढ़ने के लिए परिवार का पूरा समर्थन मिलता है। उनकी तरह ही जिले की तमाम लड़कियां कुश्ती में आगे बढ़ने के लिए लालायित हैं। लड़कियों को अलग से स्तरीय प्रशिक्षण की जरूरत है। जिससे वे हरियाणा और दिल्ली की महिला पहलवानों की तरह मेडल जीतकर गांव-देश का नाम रोशन कर सकें।
बचपन से ही कुश्ती में जाने की इच्छा
हेंगापुर सिधारी निवासी तन्नू यादव ने बताया कि बचपन से ही कुश्ती में जाने की इच्छा रही। अभी दसवीं में पढ़ाई कर रही हैं। जिस प्रकार से लड़कियों ने खेल के माध्यम से देश का परचम ओलंपिक जैसी प्रतियोगिताओं में लहराया है, उससे कुश्ती की लोकप्रियता तेजी से बढ़ी है। सोशल मीडिया के माध्यम से महिला पहलवानों के बारे में जानकारी होने के बाद हमारे माता-पिता भी प्रभावित हैं। अब वे अपनी बेटियों को कुश्ती जैसे दमखम वाले खेल में भेजने में हिचक नहीं रहे हैं। जिससे इस खेल में लड़कियों की संख्या तेजी से बढ़ रही है।
स्टेडियम में एक हॉल पड़ जाता छोटा
चंदौका आहोपट्टी निवासी प्रिया चौहान ने बताया वह प्रतिदिन घर से अपने भाई के साथ साइकिल से कुश्ती सीखने के लिए 6 किमी दूर सुखदेव पहलवान स्टेडियम आती हैं। यहां पर एक ही हॉल में निर्धारित समय में सभी खिलाड़ियों की एक साथ कुश्ती होने के कारण जगह की दिक्कत होती है। इसके साथ ही किनारे खेलने में चोट का भी खतरा रहता है। खिलाड़ियों की बढ़ती संख्या को देखते हुए स्टेडियम में एक और हॉल बनवाया जाना चाहिए।
अभ्यास के लिए नहीं मिल पाता पर्याप्त समय
अभय गुप्ता ने बताया कि वह दो साल से अपने घर छतवारा से साइकिल से प्रतिदिन ब्रह्मस्थान स्थित सुखदेव पहलवान स्टेडियम आते हैं। घर से करीब सात किमी दूर स्टेडियम तक जाने के लिए रास्ते में तमाम परेशानियों से गुजरना पड़ता है। शहर के बीच होने से कई बार ट्रैफिक जाम के चलते जब तक स्टेडियम पहुंचते हैं तब तक थककर चूर हो जाते हैं। गर्मी के मौसम में काफी दिक्कत हो जाती है। स्टेडियम में खेलने का भी पूरा समय नहीं मिल पाता है। पूरी क्षमता के साथ नहीं सीख पाने से लक्ष्य को लेकर आशंका बनी रहती है। अनुज यादव ने बताया कि वह बेलइसा से स्टेडियम आते हैं। रास्ते में कई जगह जाम से जूझना पड़ता है।
नेशनल खेलकर गांव में करना पड़ता है अभ्यास
मेंहनगर तहसील के विजयीपुर निवासी दुर्गविजय यादव ने बताया कि उन्होंने 12वीं की पढ़ाई इटावा के सैफई स्थित स्पोर्ट्स कॉलेज से की थी। इसके बाद वापस घर आना पड़ा। दूरदराज गांव में घर होने के चलते रोज शहर तक नहीं आ सकते हैं। इसलिए अपने गांव के खेत में ही छोटा सा अखाड़ा खोलकर मैट लगाए हैं। मैदान की सुविधा नहीं मिलने के कारण सड़क पर दौड़कर आर्मी व पुलिस भर्ती की तैयारी भी करते हैं। नेशनल कुश्ती प्रतियोगिता में 50 किलो भार वर्ग में ब्रांज मेडल जीत चुके हैं। दो बार ऑल इंडिया यूनिवर्सिटी प्रतियोगिता में भी प्रतिभाग कर चुके हैं। गांव में रहकर आगे बढ़ना बहुत ही मुश्किल है। ग्रामीण इलाके की प्रतिभाओं को अगर सुविधा और संसाधन मिले तो वे काफी आगे जा सकती हैं।
हरियाणा की तरह मिले यहां भी सुविधा
मोहब्बतपुर निवासी अश्विनी सिंह ने बताया कि खेल को बढ़ावा देने के लिए प्रशासन को ग्रामीण इलाकों में सुविधा प्रदान करनी चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों कुश्ती को लेकर युवाओं में बहुत जोश है, प्रतिभा भी है लेकिन सुविधा नहीं मिल पाने के चलते पीछे ही रह जाते हैं। मिट्टी के अखाड़ों पर ही अभ्यास कर पाते हैं। गांवों में मैट की सुविधा नहीं मिल पाती है। जबकि हरियाणा जैसे छोटे प्रदेश में युवाओं को गांवों में ही मैट के साथ ही राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ियों की तरफ प्रशिक्षण मिलता है। इसलिए हरियाणा जैसा प्रदेश कुश्ती के क्षेत्र में बहुत आगे है। यहां के खिलाड़ी ओलंपिक, एशियाड और कॉमनवेल्थ प्रतियोगिताओं में मेडल जीतते हैं। जबकि इधर अपनी तरफ प्रतिभाओं को आगे बढ़ने का मौका ही नहीं मिल पाता है।
गर्मी से हाल बेहाल, एसी युक्त हॉल की हो व्यवस्था
विवेक ने बताया कि वह नीबी बम्हौर से प्रतिदिन सुखदेव पहलवान स्टेडियम में कुश्ती का अभ्यास करने आते हैं। यहां स्टेडियम में चारों तरफ युवाओं की भीड़ नजर आती है। एक ही हॉल में सभी को शाम को प्रैक्टिस करनी होती है। गर्मी के दिनों में इस हॉल में प्रैक्टिस करना भारी पड़ता है। भीड़ अधिक होने के कारण हॉल में खिलाड़ी पसीने से तरबतर हो जाते है। यहां एसी युक्त हॉल की व्यवस्था करानी चाहिए। युवाओं को कुश्ती क्ज्ञ दांव-पेच सीखने के लिए ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ेगी। सही जगह पर ऊर्जा खर्च होने से आगे बढ़ने का मौका मिलेगा।
गांव के अखाड़ों में भी हो मैट की सुविधा
सागर यादव ने बताया कि वह मेंहनगर के पवनी खुर्द के निवासी हैं। उनके गांव से शहर दूर पड़ता है। रोज आना संभव नहीं है। गांव के आसपास अखाड़ा भी नहीं है। कई किलोमीटर साइकिल चलाकर सबसे नजदीक अखाड़े पर जाना होता है। यहां हर दिन आ पाना मुश्किल होता है। हमारी तरह परिवार वाले भी चाहते हैं कि कुश्ती के खेल में आगे बढ़ें, लेकिन बेहतर प्रशिक्षण के अभाव में संभव नहीं हो पा रहा है। प्रशासन को एक बेहतर रणनीति तय कर संरचना बनानी चाहिए। जिससे युवा पहलवानों को पास के अखाड़ों में अच्छी सुविधा मिल सके। नीबी शाहगढ़ निवासी दुर्गेश यादव ने बताया कि गांव में या आसपास के अखाड़ों में मैट की सुविधा मिल जाए तो भी उनका काम काफी आसान हो जाएगा।
पहलवानों की बात :
-दो साल से कुश्ती की प्रैक्टिस कर रहे हैं। सात किमी दूर से आना पड़ता है। स्टेडियम पहुंचने में ही थकावट आ जाती है।
-अभय गुप्ता
-लड़कों के लिए गांवों में अखाड़े हैं, मगर लड़कियों के लिए कोई व्यवस्था नहीं है। कुश्ती प्रेमियों को इसके लिए आगे आने की जरूरत है।
-प्रिया चौहान
-सैफई खेल हॉस्टल से निकलकर गांव आया, तो यहां दिक्कत होने लगी। नेशनल तक कुश्ती लड़ चुका हूं। गांव में खेत में प्रैक्टिस करने के लिए मजबूर हूं।
-दुर्गविजय यादव
-सरकार ग्रामीण क्षेत्रों के युवाओं को कुश्ती में बढ़ावा देने के लिए ध्यान नहीं देती है। अन्य खेलों के लिए ब्लाक स्तर पर खेल के मैदान हैं, लेकिन अखाड़ों की सुविधा नहीं है।
-अश्वनी सिंह
-पहलवानी करने के लिए उचित पोषण और डाइट की जरूरत पड़ती है। इसकी पूर्ति के लिए परिवारवालों को परेशानी झेलनी पड़ती है।
-विवेक
-ग्रामीण क्षेत्रों में आधुनिक जिम और कुश्ती अखाड़ें नहीं होने से युवा बीच में ही कुश्ती छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं। इस पर जनप्रतिनिधि भी ध्यान नहीं देते हैं।
-सागर यादव
-नीबी, बम्होर, मुहब्बतपुर ऐसे गांव हैं जहां बेटियां कुश्ती में नाम कमा रही हैं। इसके बाद भी इस इलाके में आधुनिक अखाड़े की व्यवस्था नहीं की जा रही है।
-अनुपमा
-तीन साल तक साईं हॉस्टल में रहकर पढ़ाई के साथ ही कुश्ती भी लड़ती रही। गांव में इस तरह की सुविधा से वंचित होना पड़ रहा है।
-रंजनलता
-पिता नहीं हैं। दो भाई स्टेट स्तर पर कुश्ती लड़ चुके हैं। सात भाई-बहनों में सबसे छोटी हूं। भाइयों की प्रेरणा से कुश्ती लड़ रही हूं। जबकि साथ की कई लड़कियों ने संसाधनों के अभाव में छोड़ दिया।
-कंचन
-गांव में कई लड़कियों में कुश्ती को लेकर जज्बा है, मगर अखाड़ा नहीं है। साइकिल से दस किमी दूरी तय कर स्टेडियम में प्रैक्टिस करने के लिए आना पड़ता है।
-प्रीती यादव
-एक भाई और चार बहनों में सबसे बड़ी हूं। पढ़ाई के साथ कुश्ती के प्रति भी जज्बा है। डाइट के लिए घर पर छह भैंस हैं। परिवार का हर तरह से समर्थन मिलता है ।
-जया विश्वकर्मा
-अधिकतर मां-बाप बेटियों को कुश्ती क्षेत्र में उतारना नहीं चाहते हैं। अभिभावकों को बेटियों को भी आगे करना चाहिए।
-तन्नू यादव
सुझाव :
गांवों में अखाड़े होने चाहिए। अखाड़े पर मैट की व्यवस्था हो। साथ ही कुश्ती के कोच रखे जाएं। तभी देश को मेडल मिलेगा।
सुखदेव पहलवान स्टेडियम में बनकर तैयार खेल छात्रावास को चालू करना चाहिए। जिससे छात्रावास में रहकर पढ़ाई के साथ युवा पहलवानी भी कर सकें।
जिले में नेशनल स्तर की कुश्ती प्रतियोगिताएं आयोजित होनी चाहिए। जिससे युवा पहलवानों को प्रदर्शन करने का मौका मिल सके।
क्रिकेट की तरह कुश्ती में भी मेडल जीतने पर पुरस्कार राशि मिलनह चाहिए। इससे पहलानों का हौसला और बुलंद होगा।
लड़कियों में कुश्ती को बढ़ावा देने के लिए अभिभावकों के बीच जागरूकता अभियान चलाना चाहि। जिससे सामाजिक बंधनों को तोड़कर बेटियां भी आगे आएं।
शिकायतें :
उचित पोषण और डाइट का खर्च खुद परिवार वालों को उठाना पड़ता है। गरीब परिवारों के युवाओं को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ता है।
सुसज्जित अखाड़े के अभाव में गांवों में खेतों में प्रैक्टिस करनी पड़ती है। कोई ट्रेनिंग देने वाला भी नहीं होता है। फिर भी नेशनल स्तर पर खेलते हैं।
मैट पर कुश्ती लड़ी जाती है। गांव में मैट की व्यवस्था न होने से लड़कियों को दस किमी की दूरी तय कर स्टेडियम में प्रैक्टिस के लिए आना पड़ता है।
जिले में कुश्ती कोच की कमी के चलते युवाओं को प्रैक्टिस करने में दिक्कत आती है। ब्लाक स्तर पर अन्य खेलों की तरह कुश्ती के लिए उपकरण भी नहीं दिए जाते हैं।
अच्छी तरह से प्रैक्टिस न होने पर कुश्ती प्रतियोगिता में शामिल होने से पहले तनाव रहता है। बाजी मारने का दबाव और असफलता का भय बना रहता है।
स्टेडियम में आने वाले सभी खिलाड़ियों को नियमित अभ्यास कराया जाता है। महिला पहलवानों के लिए कुछ दिक्कतें हैं। स्टेडियम में बने छात्रावास को हैंडओवर कराने का प्रयास किया जा रहा है। उम्मीद है कि पखवारे भर के भीतर छात्रावास हैंडओवर हो जाएगा। जिसके बाद इसे महिला खिलाड़ियों को प्राथमिकता देते हुए आंवटित किया जाएगा। इससे महिला पहलवानों की परेशानी काफी हद तक दूर हो जाएगी।
सिराजुद्दीन क्षेत्रीय क्रीड़ा अधिकारी।
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