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जाति गणना के आंकड़ों से नीतीश को कैसे हो सकता है नुकसान, समझें- बिहार में 2024-25 की सियासी तासीर?

फिलहाल बिहार में अत्यंत पिछड़ा वर्ग (EBC) को 18 फीसदी, पिछड़ा वर्ग को 12 फीसदी, अनुसूचित जाति को 16, अनुसूचित जनजाति को एक, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को 10 और महिलाओं को 3 फीसदी आरक्षण दिया जा रहा है।

Pramod Praveen लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्लीMon, 2 Oct 2023 07:01 PM
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जाति गणना के आंकड़ों से नीतीश को कैसे हो सकता है नुकसान, समझें- बिहार में 2024-25 की सियासी तासीर?

बिहार में जातीय जनगणना के आंकड़े जारी हो चुके हैं। यह बात पुख्ता तौर पर उभर कर सामने आ चुकी है कि सबसे ज्यादा यादवों की संख्या है। उनकी हिस्सेदारी 14.27  फीसदी है। इस जाति का सियासी झुकाव राजद की ओर रहा है। वहीं गठबंधन सरकार के दूसरे सबसे बड़े दल जेडीयू के नेता और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की जाति कुर्मी की आबादी मात्र 2.88 फीसदी है। नीतीश कुशवाहा वोटरों में भी सेंधमारी करते रहे हैं और कभी लव-कुश समीकरण के एकछत्र सेनानी रहे हैं। नए सर्वे के मुताबिक, कोइरी (कुशवाहा) की आबादी 4.21 फीसदी है।

जातीय जनगणना में जो सबसे बड़ी बात उभर कर आई, वह यह कि ईबीसी कैटगरी यानी अत्यंत पिछड़ा वर्ग सबसे बड़ी आबादी वाला समूह है। आंकड़ों के मुताबिक समाज में उसकी हिस्सेदारी 36.01 फीसदी है, जबकि पिछड़ा वर्ग जिसमें यादव, कोईरी-कुर्मी शामिल है, उसकी आबादी 27.12 फीसदी है। केंद्र सरकार की नौकरियों में ओबीसी कैटगरी के कोटे पर अधिकांश कब्जा इन्हीं तीन जातियों का होता है। ऐसे में अब ये मांग उठ सकती है कि ओबीसी कैटगरी को मिलने वाले कोटे के अंदर कोटा लागू किया जाए। केंद्र सरकार ने इसी के लिए जस्टिस रोहिणी कमीशन का गठन किया था, जिसकी रिपोर्ट राष्ट्रपति को सौंपी जा चुकी है।

दूसरी तरफ, ईबीसी जातियां, जिनके संख्याबल की हिस्सेदारी का पहली बार पता चला है, वह सियासी पहचान और प्रतिनिधित्व के लिए आवाज उठा सकता है। हालांकि, ईबीसी कैटगरी का विभाजन सबसे पहले 1978 में तत्कालीन मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर ने किया था लेकिन उनकी सरकार खत्म होते ही उनका कोटा सिस्टम भी ध्वस्त हो गया था। उसके करीब तीन दशक बाद नीतीश कुमार ने इस ईबीसी कैटगरी को उनका अधिकार दिया और पिछड़ा वर्ग को अत्यंत पिछड़ा वर्ग में विभाजित कर न सिर्फ उन्हें अलग पहचान दिलाई बल्कि राज्य सरकार की नौकरियों में उन्हें अलग से आरक्षण भी दिया। इसके बदले में ईबीसी समाज का अधिकांश वोट नीतीश को जाता रहा है।

फिलहाल बिहार में अत्यंत पिछड़ा वर्ग (EBC) को 18 फीसदी, पिछड़ा वर्ग को 12 फीसदी, अनुसूचित जाति को 16 फीसदी, अनुसूचित जनजाति को एक फीसदी, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को 10 फीसदी और महिलाओं को तीन फीसदी आरक्षण दिया जा रहा है। बिहार ने अब तक 50 प्रतिशत आरक्षण सीमा का उल्लंघन नहीं किया है लेकिन जातीय गणना के नए आंकड़े सार्वजनिक होने के बाद से आरक्षण की आग फिर से भड़क सकती है। इससे निपटना नीतीश सरकार के लिए मुश्किल होगी।

अगले साल लोकसभा चुनाव होने हैं। उसके बाद 2025 में बिहार विधानसभा चुनाव भी होने हैं। जातीय समीकरणों और जातीय ध्रुवीकरण पर आधारित राजनीति में टिकटों का बंटवारा, उम्मीदवारों का चयन और हार-जीत भी जातीय गणित पर ही आधारित होता है। ऐसे में सिर्फ 2.88 फीसदी आबादी के नेता के रूप में नीतीश कुमार को झटका लग सकता है क्योंकि 4.21 फीसदी वाले कोईरी समाज के वोट बैंक में उपेंद्र कुशवाहा, बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष सम्राट चौधरी और राजद के नेता भी सेंधमारी में जुटे हैं। उनके स्वजातीय वोटों में भी सेंधमारी के लिए उनके ही करीबी रहे आरसीपी सिंह को भी खड़ा किया गया है।

तीसरी बड़ी बात कि नीतीश का आधार सिर्फ कोइरी-कुर्मी के जातीय समीकरणों तक सीमित नहीं रहा है। वह ईबीसी वोट बैंक के बड़े साधक माने जाते रहे हैं लेकिन हाल के कुछ वर्षों में इसमें भी बीजेपी ने सेंधमारी की कोशिश की है। अब नए आंकड़ों के बाद ईबीसी कैटगरी के अंदर से ही नई आवाज उठ सकती है, जिसका असर जेडीयू के सियासी समीकरणों और सेहत पर पड़ सकता है।

लालू यादव की पार्टी राजद, जो यादव और मुल्सिम समीकरण के लिए जानी जाती है, करीब 32 फीसदी (14.27 और मुस्लिम-17.70 फीसदी)  आबादी का बेस पाकर गदगद दिख रही है। हालांकि, उसके अन्य जातीय वोटों में बिखराव भी देखने को मिल सकता है। वैसे नीतीश को भी कुछ हद तक यादवों और मुस्लिमों का वोट मिलता रहा है लेकिन राजद के उभार के बाद जेडीयू के लिए वह संभावना क्षीण होती दिख रही है। हालांकि, राजद और जेडीयू के एकजुट रहने की दशा में यह जातीय गणित मास्टरस्ट्रोक के रूप में काम कर सकता है।