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बोले रामपुर : ई-रिक्शा और ऑटो के दौर में रिक्शा चालकों के रोजगार पर गहराया संकट

Rampur News - शहर में रिक्शा चालक महंगाई, ट्रैफिक जाम और सख्त नियमों के बीच आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं। ई-रिक्शा और ऑटो के बढ़ते चलन से उनकी आमदनी में गिरावट आई है। स्वास्थ्य समस्याएं और डिजिटल भुगतान की कमी...

Newswrap हिन्दुस्तान, रामपुरWed, 12 March 2025 11:09 PM
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बोले रामपुर : ई-रिक्शा और ऑटो के दौर में रिक्शा चालकों के रोजगार पर गहराया संकट

शहर में रिक्शा चालक अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में कई समस्याओं का सामना कर रहे हैं। बढ़ती महंगाई, ट्रैफिक जाम और सख्त नियमों के बीच उनका जीवन कठिन हो गया है। इन चालकों की सबसे बड़ी चिंता उनकी आय है, जो महंगाई के बढ़ने के बावजूद उतनी नहीं बढ़ी है, जिससे उनका गुजारा मुश्किल हो रहा है। स्वास्थ्य समस्याएं, ट्रैफिक पुलिस और नगर पालिका अधिकारियों का दबाव, प्रतिस्पर्धा बढ़ने से उनकी स्थिति और भी कठिन हो गई है। ई-रिक्शा और ऑटो के बढ़ते चलन ने उनकी आमदनी पर असर डाला है। डिजिटल भुगतान की मांग और उम्र के कारण उन्हें रिक्शा चलाने में और भी मुश्किलें आ रही हैं। रिक्शा चालकों के लिए यह स्थिति लगातार चुनौतीपूर्ण होती जा रही है और वे इस कठिनाइयों से बाहर निकलने के लिए सुधार की उम्मीद जता रहे हैं।

रिक्शा, सफर करने के लिए सस्ता साधन है, लेकिन अब ऑटो और ई-रिक्शा के चलन से इस साधन पर संकट गहरा रहा है। रिक्शा चालक आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं। वे बताते हैं कि हर किसी को अपने गंतव्य तक पहुंचने की जल्दी है। इसलिए लोग तेज चलने वाले वाहनों से सफर करना पसंद कर रहे हैं। इस वजह से सवारियां रिक्शा में बैठने से कतराने लगी हैं। साथ ही, अब माल ढुलाई में रिक्शा का चलन कम हो गया है।

रिक्शा चालक बताते हैं कि रामपुर जिलेभर में अब सिर्फ 300 लोग ही रिक्शा चलाकर गुजर-बसर कर रहे हैं, जबकि 2000 से अधिक लोग ई-रिक्शा चला रहे हैं। रामपुर में सपा नेता आजम खां ने जब ई-रिक्शा की शुरुआत की, तभी से रिक्शा का चलन कम होता गया। ई-रिक्शा खरीदने के लिए लोगों का रुझान बढ़ा तो साइकिल रिक्शा के चलन पर संकट आ गया। रिक्शा चालकों ने बताया कि लोग हमें सम्मान की नजर से नहीं देखते हैं। हम भी समाज के लोगों से थोड़ा सम्मान और गरिमा की उम्मीद करते हैं, लेकिन ऐसा नहीं होता है। बताते हैं कि लोग रिक्शा से सफर करना पसंद नहीं करते हैं। रिक्शा चालकों को अब सवारी सिर्फ उसी जगह मिलती है जहां ऑटो या ई-रिक्शा नहीं जा पाते हैं। जिस भी रिक्शा चालक के पास रुपये थे, उसने अपना व्यवसाय बदल लिया। अब शहर में वे ही लोग रिक्शा चला रहे हैं जिनकी आर्थिक स्थिति कमजोर है। रिक्शा का चलन विलुप्त होने की कगार है। बहुत से रिक्शा चालकों की उम्र 50 वर्ष से ज्यादा है। उनके परिजन भी चाहते हैं कि सवारी उनसे सम्मानजनक बात करें। ये समस्याएं शहर के रिक्शा चालकों के जीवन को प्रभावित कर रही हैं और उनके लिए बेहतर नीति, प्रशिक्षण और सहयोग की आवश्यकता को रेखांकित करती हैं। रिक्शा चालकों का कहना है कि बदलते समय के साथ हम लोग खुद को नहीं बदल पाए, जिसका नतीजा भुगत रहे हैं। रिक्शा चालक सरकार से आर्थिक मदद और सामाजिक सुरक्षा की उम्मीद कर रहे हैं।

मेहनत ज्यादा होने से बीमार होते हैं चालक

रामपुर। इस समय जिले में रिक्शा चालक आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं। ई-रिक्शा और ऑटो के चलन से पहले रिक्शा कमाई का बेहतर जरिया हुआ करता था। हालांकि, रिक्शा चालक अपने काम में व्यस्त होने के कारण स्वास्थ्य का ठीक से ध्यान नहीं रख पाते हैं। ड्राइविंग मुद्रा भी पाचन तंत्र के लिए समस्याएं पैदा करती है। रिक्शा चालक बताते हैं कि ठंड, बारिश और गर्मी में बिना आराम किए काम करना पड़ता है, जिससे सेहत खराब हो जाती है। हमें स्वास्थ्य बीमा या चिकित्सा सहायता की सुविधा नहीं मिलती। हमारी कमाई इतनी नहीं है कि किसी अच्छे निजी अस्पताल में इलाज करा सकें।

संकरी गलियों में रिक्शा से जाना था आसान

रामपुर। एक जमाना था, जब शहर की संकरी गलियों में जाने के लिए साइकिल रिक्शा के अलावा दूसरा साधन नहीं था। बिलासपुर गेट से शुरू होकर सिविल लाइंस, राधा रोड, माला रोड, तोपखाना गेट, जिला कचहरी, तहसील, रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड, मालगोदाम सहित शहर के कोनों में कहीं जाना हो तो लोग साइकिल रिक्शा को तरजीह देते थे। लोग शहर में एक से तीन किलोमीटर तक का सफर कर सकते थे। ई-रिक्शाओं ने साइकिल रिक्शा चालकों का रोजगार भी छीन लिया है। उन गरीब बुजुर्गों का, जिनके बाजू अब इस हालत में नहीं हैं कि वे बुढ़ापे में ई-रिक्शा को संभाल सकें, न ही उनके पास इसे खरीद पाने के लिए रुपये ही हैं। रिक्शा चलाने वाले कुछ ही हैं्र

सुझाव और शिकायतें

1आसान और कम ब्याज पर ऋण देने की व्यवस्था की जाए ताकि ई रिक्शा खरीद सकें। कोई दूसरा व्यवसाय करने के लिए सब्सिडी या आर्थिक सहायता प्रदान की जाए।

2 रिक्शा चालकों को एप और डिजिटल बुकिंग प्लेटफॉर्म से जोड़ा जाए। ग्राहकों के साथ बेहतर संवाद और व्यवसाय बढ़ाने के लिए मदद हो। डिजिटल भुगतान प्रणाली के बारे में प्रशिक्षण दिया जाए।

3 रिक्शा चालकों को सरकारी योजनाओं का लाभ देने के लिए बेहतर व्यवस्था की जाए। इस काम को समाज में सम्मानजनक बनाया जाए।

4 रिक्श चालकों की सुरक्षा जरूरी है। इन्हें शोषण से बचाने के लिए सख्त कानून लागू जाए। शहर में रिक्शा स्टैंड बनना चाहिए।

5 रिक्शा चालकों को सरकार की और से मुफ्त स्वास्थ्य बीमा का लाभ दिया जाए। कैंप लगाकर उनका स्वास्थ्य परीक्षण किया जाए।

1 समाज में रिक्शा चालकों के प्रति सम्मानजनक दृष्टिकोणा अभाव नहीं है। इनकी समस्याओं को अनदेखा किया जा रहा है।

2 डिजिटल और एप से किराए के रुपयों का भुगतान होने पर रिक्शा चालकों को कम सवारी मिल रही है। नई तकनीक सीखने में दिक्कत का सामना करना पड़ रहा है।

3 खराब मौसम में काम करने में दिक्कत होती है। क्षमता से अधिक काम करना पड़ता है। इससे स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं होती है।

4 दुर्घटना में रिक्शा चालक घायल हो जाए तो मुफ्त इलाज की व्यवस्था नहीं है। आर्थिक मदद भी नहीं मिल पाती है।

5 ई-रिक्शा और ऑटो के चलन से रिक्शा चालकों के सामाने रोजगार का संकट गहराया है। वे आर्थिक तंगी का सामना कर रहे हैं। इससे परेशानी बढ़ गई है।

हमारी भी सुनें

जिन लोगों की आर्थिक स्थिति ठीक थी, उन्होंने ई-रिक्शा खरीद लिए और आज अच्छी कमाई कर रहे हैं, लेकिन मेरे पास इतने रुपये नहीं हुए कि ई रिक्शा खरीद सकू, मजबूरी में आज भी रिक्शा ही चलाना पड़ता है।

-खलील अहमद

कुछ वर्ष पहले तक रिक्शा चलाने से कमाई बेहतर होती थी, लेकिन अब रिक्शा का चलन खत्म होने की कगार पर है और कमाई भी नहीं हो पाती है। हमारे सामने रोजगार का संकट आने लगा है।

-अफसर अली

कमाई इतनी कम हो गई है कि किसी दिन मायूस होकर भी घर जाना पड़ता है। परिवार को पालना मुश्किल हो गया है, किसी के बीमार होने पर कर्ज ही लेकर इलाज करना पड़ता है। हमें स्वास्थ्य सेवा का लाभ नहीं मिलता है।

-उस्मान

स्सरकार से मांग है कि रिक्शा चालकों के लिए आर्थिक प्रदान किया जाए। ताकि बढ़ती उम्र में रिक्शा न चलाना पड़े। रिक्शा चलाकर परिवार को पालना मुश्किल काम हो गया है। हम आर्थिक संकट झेल रहे हैं।

-जमील

मैं घर में अकेला कमाने वाला हूं। वर्ष पहले तक रिक्शा चलाकर परिवार को पालना आसाना था, लेकिन ई-रिक्शा आने के बाद हमारी कमाई घट गई है। दिनभर में 100 से 200 रुपये कमाने भी मुश्किल हो रहे हैं।

-जमील अहमद

अब हमारी मजबूरी यह करा रही है। परिवार के पालन पोषण के लिए कमाना पड़ता है। रिक्शा चलाने वालों की स्थिति है कि प्रतिदिन कमाओ और खाओ। इस कमाई से वे आर्थिक बचत नहीं कर पाते हैं।

-तस्लीम

डिजिटल भुगतान के बढ़ते चलन के कारण हमें तकनीकी ज्ञान की कमी महसूस होती है। अब अधिकतर लोग डिजिटल भुगतान यूपीआई के माध्यम से करना चाहते हैं। ऐसे सवारी को कभी-कभी हमें छोड़ना पड़ता है।

-जावेद

रेलवे स्टेशन के पास रिक्शा खड़ा करने पर पुलिसकर्मी धमकाने लगते हैं। कहते हैं कि रिक्शा इधर से हटाओ, फिर सवारी के लिए लोग किधर जाए। ऐसे में हमें काम करने में दिक्कत बढ़ जाती है।

-मोहम्मद आसिफ

रिक्शा चलाने में शारीरिक परिश्रम बहुत ज्यादा है और कमाई बहुत ही कम। रात में बिस्तर पर जाने के बाद ऐसी नींद आती है कि पता ही नहीं चलता कब सुबह हो गई। सरकार हमारी मदद करे तो राहत होगी।

-नासिर

दिनभर रिक्शा चलाने से मेरी पीठ और घुटनों में दर्द रहने लगा है। ऐसी हालत में दवा खाकर रिक्शा चलाना पड़ता है। परिवार को पालने के लिए कमाई का कोई और जरिया नहीं है। आर्थिक मदद की आस लगी रहती है।

-सरदार नबी

मुझे दूसरा कोई काम आता नहीं है। इसके कारण रिक्शा चलाने के लिए मजबूर हूं। दिनभर रिक्शा चलाने पर प्रतिदिन 400 रुपये भी नहीं कमाई हो पाती है। हम गरीबी में जिंदगी जीने के लिए मजबूर हैं।

-शाहिद

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