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बोले मुरादाबाद : सरकारी विद्यालयों में दुश्वारियां झेल रहीं रसोइयां

Moradabad News - परिषदीय व कस्तूरबा विद्यालयों की रसोइयों की स्थिति खराब है। उन्हें 2000 रुपये मानदेय मिलता है, जो समय पर नहीं मिलता। रसोइयों ने सरकार से मानदेय बढ़ाने, 12 महीने का वेतन और स्वास्थ्य सुविधाएं देने की...

Newswrap हिन्दुस्तान, मुरादाबादWed, 12 March 2025 10:50 PM
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बोले मुरादाबाद : सरकारी विद्यालयों में दुश्वारियां झेल रहीं रसोइयां

परिषदीय व कस्तूरबा विद्यालयों में काम कर रहीं रसोइयों की स्थिति ठीक नहीं है। घंटों तक मेहनत कर खाना बनाने वाली इन रसोइयों की स्थिति सुदृढ़ करने के लिए सरकार की ओर से कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए। मात्र दो हजार रुपये में परिवार का खर्च चलाने वाली इन रसोइयों को मानदेय भी कभी समय से मिल पाता है और कभी नहीं। रोजाना घंटों तक मेहनत करके इन रसोइयों को बड़ी संख्या में बच्चों के लिए खाना बनाना होता है। सुबह नौ बजे से करीब दो बजे तक उनका पूरा समय खाने की तैयारी से लेकर खाना बनाने तक में चला जाता है। उनका मानना है कि सरकार के पास उनके बारे में सोचने का वक्त ही नहीं है। इस कारण उनके परिवार की आर्थिक स्थिति खराब हो रही है। सरकार को उनके मानदेय को बढ़ाने, समय से वेतन देने और उनको सरकारी कर्मचारियों की तरह सुविधाएं देनी चाहिए।

मानदेय नहीं बढ़ने से आर्थिक तंगी झेल रहीं रसोइयां

रसोइयों के सामने सबसे बड़ी परेशानी आर्थिक तंगी है। स्कूलों में खाना बनाने वाली इन रसोइयों को अब 2000 रुपये मानदेय मिल तो रहा है, लेकिन उसके पीछे उनकी वर्षों की मेहनत भी है। उनकी मांग है कि अब उनका मानदेय बढ़ा दिया जाना चाहिए। सरकार को कम से कम 10 हजार रुपये मानदेय कर देना चाहिए, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति में थोड़ा सुधार हो सके।

बताती हैं कि वे आर्थिक रूप से कमजोर हैं और मानसिक तनाव झेल रही हैं, इसका कारण ये है कि सरकार इनके बारे में कोई ठोस निर्णय नहीं ले पा रही है। जिले की 3405 रसोइयों के सामने आर्थिक स्थिति से निपटने का कोई ठोस उपाय नहीं है। साथ ही रोजाना घंटों तक मेहनत करने के एवज में उन्हें सरकार से कोई खास मदद मिलती भी नहीं दिख रही है। इसके बाद भी वे मन लगाकर अपना काम कर रही हैं।

शिकायतें

1. दो हजार रुपये मानदेय मिलता है, वो भी समय से नहीं।

2. रसोइयों को एक वर्ष में सिर्फ 10 महीने का वेतन मिलता है। बाकी अन्य एक वर्ष का पूरा वेतन पाते हैं।

3. मध्याह्न भोजन बनाने के साथ ही साथ उन्हें साफ-सफाई भी करनी पड़ती है।

4. कैशलेस इलाज की कोई सुविधा नहीं, अधिकतर पैसे खर्च हो जाते हैं दवाइयों में

5. भोजन खिलाने के बाद भी घर नहीं जा सकती, करनी पड़ती है बर्तनों की सफाई।

सुझाव

1. रसोइयों का वेतन बढ़ाकर कम से कम 10 हजार रुपये कर दिया जाए।

2. रसोइयों को शिक्षकों की ही तरह 12 महीने का मानदेय दिया जाना चाहिए।

3. रसोइयों से सिर्फ खाना बनाने का काम ही कराया जाना चाहिए।

4. स्कूल में साफ-सफाई और बर्तन धोने के लिए अलग से कर्मचारी रखा जाना चाहिए।

5. सरकार को चाहिए कि वे रसोइयों को परमानेंट कर दें और वेतन भी बढ़ाए।

क्या बोला रसोइयों ने

दो हजार रुपये में परिवार का खर्च चलाना पड़ रहा है। इतनी महंगाई में इन रुपयों से घर का खर्च चल भी नहीं पा रहा है। बहुत ज्यादा परेशानी होती है।

-चंचल

सरकारी कर्मचारियों की तरह रसोइयों को भी स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ दिया जाना चाहिए। इसके अलावा मृतक आश्रित को उचित मुआवजा दिया जाना चाहिए।

-सोमवती

विद्यालय में खाना बनाने के बाद भी काफी देर तक समय देना पड़ता है। भोजन बनाने के बाद काम खत्म होना चाहिए। साथ ही वेतन भी बढ़ना चाहिए।

-निर्दोष

नियमित रूप से मानदेय मिल रहा है। सरकार को मानदेय बढ़ाना चाहिए, इतने पैसे में अब परिवार का खर्च चलाना मुश्किल हो गया है।

-रमा

शिक्षकों की तरह हमें भी 12 महीने का वेतन मिलना चाहिए। साथ ही समय से पैसे मिल जाएं तो बेहतर। सरकार को मानदेय बढ़ाने पर भी विचार करना चाहिए।

-सुनीता

रोजाना बच्चों का खाना बनाते हैं। काफी मेहनत का काम है, इसके बावजूद सरकार हम लोगों की ओर ध्यान नहीं दे रही है। दो हजार रुपये में परिवार का खर्च चलाना बहुत मुश्किल है।

-राजवती

रसोइयों को काफी मेहनत करना पड़ता है। उनका मानदेय दो हजार रुपये से बढ़ाकर कम से कम 10 हजार रुपये कर देना चाहिए।

--सोनी

रसोइयों का प्रतिदिन का मानदेय करीब 66 रुपये है। ऐसे में उन्हें रोजाना का खर्च निकालना मुश्किल हो रहा है। सरकार को उनके मानदेय को लेकर गहन विचार-विमर्श करना चाहिए।

-रेखा

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