बोले कानपुर : बेपनाह दर्द दे रहीं हैं इन दफ्तरों की सीढ़ियां
Kanpur News - आजादी के बाद दिव्यांगों की स्थिति में सुधार की बजाय समस्याएं बढ़ी हैं। सरकारी दफ्तरों में सुविधाओं की कमी, भेदभाव और अनदेखी के चलते दिव्यांगजन को कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। दिव्यांगजन अधिकार...
आजादी के बाद हमारी श्रेणी का बस नाम बदला है, नजरिया नहीं। हम विकलांग से दिव्यांग जरूर हो गए मगर सरकारी दफ्तरों में अभी भी सिर्फ पोस्टर ब्वाय तक सीमित हैं। ये तो हमारे भीतर का जज्बा है कि सब कुछ झेलते हुए भी आगे का सफर तय करते हैं। हमने पहले भी बहुत सारे झंझावातों को झेला है, अब भी झेल रहे हैं। हमारे कदमों में जान हो या न हो, जान फूंक देने की हिम्मत जरूर रखते हैं। सरकारी मशीनरी की बात करें तो अफसर सिर्फ दिखावा करते हैं। आज भी दफ्तरों की सीढ़ियां बहुत दर्द देती हैं। रैंप बनाने तक में किसी की दिलचस्पी नहीं। स्थानीय स्तर पर नौकरियां देने में भी भेदभाव साफ नजर आता है मगर कहने किससे जाएं। बस दावे हैं, दावों का क्या...। इन शब्दों के साथ दिव्यांगों ने अपनी व्यथा साझा की।
दिव्यांगजनों को सम्मान जनक जीवन देने के लिए दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 19 अप्रैल 2017 से लागू हुआ। अधिनियम में परिभाषा दिव्यांगता के सात प्रकारों को बढ़ाकर 21 कर दिया गया। तेजाब हमले में जख्मी भी दिव्यांग की श्रेणी में शामिल किए गए। शिक्षा और सरकारी नौकरियों में दिव्यांग को 4 प्रतिशत आरक्षण दिया गया। इसी प्रकार 6 से 18 वर्ष तक के दिव्यांग बच्चों को निशुल्क शिक्षा का प्रावधान किया गया। दिव्यांगों के लिए विशेष न्यायालयों की व्यवस्था की गई। हैरानी की बात है कि इन तमाम प्रावधानों के बावजूद दिव्यांगों की जिंदगी में कोई खास बदलाव नहीं आ पाया। आज भी सार्वजनिक स्थलों पर सुविधाओं और संसाधनों की कमी का सामना दिव्यांग कर रहे हैं। दृग्श्रम स्वयं सेवा समिति के सुनील मंगल ने बताया कि दिव्यांगों को सरकारी दफ्तरों की सीढ़ियां बहुत दर्द देती हैं। विकास भवन, श्रम विभाग मुख्यालय जैसे अहम विभागों में दिव्यांगों के लिए रैंप तक की सुविधा नहीं है। दूसरे विभागों की तो बात ही छोड़िए विकास भवन की ही लिफ्ट बंद पड़ी है। शौचालयों में दिव्यांगों के लिए यूरिनल की अलग से व्यवस्था नहीं है। अब इसे क्या कहें, समझ जाइए कि अफसर हमें लेकर कितने गंभीर हैं।
ट्रेन में बीच में हो दिव्यांग कोच : सुनील मंगल कहते हैं कि ट्रेनों में दिव्यांग कोच इंजन या गार्ड के डिब्बे के पास होता है। ऐसे में दिव्यांगों को बहुत कष्ट सहना पड़ता है। कई मर्तबा उनकी ट्रेन भी छूट जाती है। कुछ स्टेशनों पर तो दिव्यांग कोच प्लेटफॉर्म से दूर होता है। ऐसे में दिव्यांग कोच में दिव्यांग नहीं चढ़ पाते हैं। सरकार को चाहिए कि दिव्यांग कोच को बीच में रखें। ताकि, दिव्यांग जन को मेन गेट से आने-जाने में आसानी हो। रेलवे स्टेशन पर प्रवेश और निकास गेट बीच में होता है। इस समस्या पर ध्यान देने की आवश्यकता है।
रोडवेज बसों के ड्राइवर नहीं रोकते बस : दिव्यांगजनों ने बताया कि रोडवेज की बस में सरकार दिव्यांगजनों को निशुल्क सफर की सुविधा प्रदान किए है, लेकिन रोडवेज बसों के ड्राइवर दिव्यांगजन को देखकर बस नहीं रोकते हैं। बसों में दिव्यांगजनों के लिए सीट आरक्षित है। दिव्यांगजन जब बस में चढ़ते हैं तो दिव्यांग सीट पर कोई यात्री बैठा रहता है। कंडक्टर से सीट खाली कराने के लिए कहा जाता है तो बदसलूकी का शिकार होना पड़ता है।
सरकारी कार्यों के लिए सिंगल विंडो सिस्टम बने : दिव्यांगों को मेडिकल प्रमाण पत्र बनवाने के लिए रामा देवी स्थित सीएमओ कार्यालय से लेकर सेवायोजन परिसर स्थित दिव्यांगजन कार्यालय और उर्सला तक के चक्कर लगाने पड़ते हैं। यदि दिव्यांगता प्रमाण पत्र, राशन कार्ड और फैमिली कार्ड प्रमाण के लिए सिंगल विंडो सिस्टम बना दिया जाए तो दिव्यांगों को करीब 50 किमी का चक्कर लगाने से मुक्ति मिल जाएगी।
इलेक्ट्रिक बसों के लिए अलग पास : दिव्यांगजनों ने बताया कि दिव्यांगों का रोडवेज की बस का पास बना है। बावजूद इसके इलेक्ट्रिक बसों के लिए अलग से पास बनवाया जा रहा है, जिसके लिए उन्हें अलग से रुपये भी देने पड़ रहे हैं। यूडीआईडी से सभी बसों में यात्रा की सुविधा मिलनी चाहिए। अगर ऐसा होता है तो दिव्यांगजनों को काफी सहूलियत मिलेगी।
दिव्यांगों को कम देते हैं सैलरी : मूकबधिर कपिल तिवारी मल्टीनेशनल ई-कॉमर्स कंपनी में कार्यरत हैं। उनकी टीम में 20 कर्मी हैं। कंपनी प्रबंधन उनके साथ भेदभाव करता है। कोई समस्या होती है तो वह लिखकर बताते हैं, जिसे अनसुना कर दिया जाता है। लिहाजा, मन मसोस कर रह जाते हैं। उनके साथ एक समान काम करने वाले सहकर्मियों को 15 से 18 हजार रुपये महीना वेतन दिया जाता है। जबकि, उन्हें कंपनी महज 12000 रुपये देती है।
दिव्यांग को तीसरे मंजिल पर आवास : राकेश रानी आर्या और उनके पति दिव्यांग हैं। उन्हें 2010 में कांशीराम कॉलोनी में आवास आवंटित हुआ था। डूडा ने दिव्यांग दंपत्ति को ग्राउंड फ्लोर के बजाय सेकंड फ्लोर पर आवास आवंटित कर दिया। अधिकारियों को यह भी नहीं समझ आया कि दंपति सीढ़ियों से अपने आवास में कैसे जाएंगे। यही वजह रही कि 2023 तक दंपति सीढ़ियों पर घिसट कर चढ़ते रहे। 2023 में एक सज्जन रहवासी ने दिव्यांग दंपति से अपना आवास बदल लिया। तब राहत मिली।
सुझाव
1. पेंशन पा रहे दिव्यांगों का गरीबी रेखा के नीचे का राशन कार्ड बनाया जाए
2. दिव्यांगों को केस्को से निशुल्क विद्युत कनेक्शन दिया जाए
3. एक किलोवॉट के कनेक्शन पर दो रुपये प्रति यूनिट शुल्क लें
4. दिव्यांगों को कम से कम 1,500 रुपये मासिक पेंशन दी जाए
5. विवाहित दिव्यांगों को 10,000 रुपये बेरोजगारी भत्ता दिया जाए
6. दिव्यांगजन के लिए इलेक्ट्रिक बसों में अलग से पास न बने
7. उज्ज्वला गैस कनेक्शन की सुविधा फिर उपलब्ध कराई जाए
8. दिव्यांगजनों के लिए खेल प्रतियोगिताएं कराई जाएं
9. कुष्ठ रोगियों को भी ट्रेन में निशुल्क सफर की सुविधा मिले
समस्याएं
1. तीन साल बाद बैसाखी दोबारा मिलने का प्रावधान
2. सरकारी व गैर सरकारी दफ्तरों में लिफ्ट व रैंप न होना
3. शौचालयों में दिव्यांगों के लिए यूरिनल बनाए ही नहीं
4. नौकरियों और वेतन में भेदभाव होता है, सामान्यजनों में अपनापन नहीं दिखता
5. दिव्यांग कार्यालय में ही शुद्ध पेयजल की समस्या है
6. इलेक्ट्रिक बसों में दिव्यांगों के चढ़ने का रैंप खराब
7 दिव्यांगजन कार्यालय पर पेयजल व्यवस्था खराब
8. दिव्यांगजनों को आवास वितरण में आरक्षण का नहीं मिल रहा लाभ
9. दिव्यांगजनों के लिए नहीं होती खेल प्रतियोगिता
बोले दिव्यांगजन
बैसाखी सरकार तीन साल के लिए देती है। जबकि डेढ़-दो साल में टूट जाती है। दोबारा लेने के लिए काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है।
-मनोज कुमार
आयुष्मान कार्ड के लिए राशन कार्ड मांगा गया। हमारे पास राशन कार्ड नहीं है। ऐसे में आयुष्मान कार्ड नहीं बनवा सके। कोई शिकायत सुनने वाला नहीं है। राजेश कुमार
रेलवे स्टेशन पर प्लेटफॉर्म तक जाने के लिए कार्ट की निशुल्क सुविधा है। दो-तीन बार स्टेशन गए तो 60 रुपये किराया मांगा गया।
-अजय मिश्र
दिव्यांग पेंशन छह माह से नहीं आ रही है। हम कार्यालय का चक्कर लगातार लग रहे हैं। कोई जवाब नहीं मिल रहा है। अफसर सिर्फ दौड़ाते रहते हैं।
-राधा कृष्ण
सरकारी संस्थाओं में अनट्रेंड अभ्यर्थी को साइन लैंग्वेज के लिए बुला लिया जाता है। जबकि, डिग्री होल्डर को नहीं बुलाते हैं। ऐसे में डिग्री होल्डर अभ्यर्थी परेशान होते हैं।
-रौनक, छात्र
दिव्यांगों को उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए निशुल्क पढ़ाई की सुविधा मिलनी चाहिए। ताकि, दिव्ंयांग भी आगे बढ़ सकें। सरकार को इसके लिए विचार करना चाहिए।
-शिवांशु त्रिपाठी
आवास के लिए कई मर्तबा आवेदन किया। बावजूद इसके उन्हें आज तक आवास का लाभ नहीं मिल सका। पक्के घर के लिए भटक रहे हैं।
-मनोज त्रिपाठी
सजारी, कांशीराम और प्रधानमंत्री आवास के लिए कई बार आवेदन किया, लेकिन आज तक आवास नहीं मिल सका। दौड़ दौड़ कर परेशान हो चुके हैं।
-सत्येंद्र पाल
बोले जिम्मेदार
पात्र दिव्यांगों को योजनाओं का लाभ दिए जाने का प्रयास चल रहा है। सरकारी कार्यालयों में रैंप और लिफ्ट को लेकर जो समस्या है, उसको लेकर शासन से पत्राचार किया जाएगा। सूची तैयार कर ली गई है। एलिम्को से जो भी उपकरण दिव्यांगों को मिलते हैं, उनकी वारंटी होती है, यदि कंपनी न-नुकुर करती है तो इसकी शिकायत दिव्यांग सीधे आकर कर सकते हैं। समस्या का समाधान कराया जाएगा।
उत्तम कुमार, जिला दिव्यांगजन सशक्तीकरण अधिकारी
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