बोले गोरखपुर: गूगल की करीबी से गुम हो रही पुस्तक मंडी की रौनक
Gorakhpur News - गोरखपुर का बक्शीपुर बाजार, जो किताबों के लिए प्रसिद्ध था, अब ऑनलाइन सामग्री की भरमार के कारण वीरान हो गया है। 1980 और 90 के दशक की रौनक अब गायब है। हालांकि, कुछ युवा व्यवसायियों ने नई प्रकाशन कंपनियों...

Gorakhpue news:बक्शीपुर बाजार का नाम आते ही आंखों के सामने किताबों की मंडी का नजारा सामने होता है। जिन्होंने अस्सी और नब्बे के दशक में यहां की रौनक देखी है, उन्हें वर्तमान समय में यहां कुछ गायब दिखेगा। किताबों की दुकानों पर न तो कतार दिखेगी न कॉपियों को लेकर मारामारी। और न ही पुराने किताबों के बदले नई किताबों को खरीदने की होड़। पुराने किताबों की बाइंडिंग कराकर पढ़ने वाले छात्र नहीं हैं तो इसके कारीगर भी गायब हो गए हैं। ऑनलाइन और गूगल में स्टडी मटेरियल की बहुतायत ने पुस्तक मंडी को वीरान कर रखा है। आठवीं तक के स्कूलों में प्रवेश के समय की मारामारी स्कूल संचालकों और कुछ बड़े खिलाड़ियों की सेटिंग में गायब हो गई है। अच्छी बात यह है कि कुछ युवा कारोबारी नया पब्लिकेशन शुरू कर चुके हैं, जो गोरखपुर विश्वविद्यालय से लेकर मुंशी प्रेमचंद की कालजयी रचनाओं का प्रकाशन कर रहे हैं।
गोरखपुर। बक्शीपुर पुस्तक मंडी आजादी के बाद ही गुलजार हो गई थी। वर्ष 1948 में कारेाबारी योगेन्द्र सिंह ने नेशनल बुक डिपो के नाम से किताबों का प्रतिष्ठान खोला। उसके बाद बक्शीपुर पूर्वांचल की सबसे बड़ी किताबों और स्टेशनरी की मंडी बन गई। वर्तमान में भी स्कूल ड्रेस, कॉपी-किताब, स्टेशनरी की करीब 200 दुकानों पर करोड़ों का कारोबार होता है। लेकिन अब पहले जैसी रौनक नहीं दिखती है। कुछ ऐसी दुकानें हैं जो पब्लिक स्कूलों के संपर्क में रहकर करोड़ों का कारोबार कर रहे हैं, लेकिन उनके प्रतिष्ठान पर भी खास रौनक नहीं दिखती है।
बक्शीपुर में पिछले कुछ वर्षों में श्याम प्लाजा, केसी टावर, जेके टॉवर, राम पैराडाइज जैसे कॉम्प्लेक्स वजूद में आए। वहीं शेर कोठी में भी दुकानें हैं। इसके साथ इस्लामिया कॉलेज प्रबंधन की दर्जनों दुकानों पर किताबों और स्टेशनरी का कारोबार होता है। मार्केट में जो कॉम्प्लेक्स वजूद में आए हैं, वहां दुकानें तो गुलजार हो गई लेकिन पार्किंग और यूरिनल जैसी मूलभूत सुविधाएं नहीं हैं। सुमन त्रिपाठी बताती हैं कि जुबिली चौक से लेकर बक्शीपुर चौराहे के बीच एक भी यूरिनल नहीं है। किसी को यूरिनल जाना है तो जुबिली चौक स्थित पब्लिक टॉयलेट का रुख करना पड़ता है। कैलाश वाच के राजकुमार का कहना है कि बाजार में जलकल की तरफ से टोटियां लगी हैं। लेकिन वह टूटी है। नालियों से सटकर लगाई गई टोटी ठीक भी होती है तो लोग यहां पानी पीने से परहेज करते हैं। बैग का कारोबार करने वाले विक्की का कहना है कि दुकानों के सामने गाड़ी खड़ी करने पर पुलिस चालान काट देती है। मार्केट में पार्किंग की व्यवस्था नहीं होने होने से बाजार में 200 से अधिक दुकानदारों समेत यहां काम करने वाले सैकड़ों लोगों की गाड़ियां सड़क पर खड़ी होती हैं। पुस्तक कारोबारी गिरीश चौबे का कहना है कि अंडरग्राउंड केबल बिछाने के नाम पर सड़क खोदी गईं। लेकिन इस चक्कर में सड़कें जगह-जगह धंस गई हैं। ऐसे में जलभराव की स्थिति में हादसे का अंदेशा बना रहता है। पूर्वांचल में कापियों की सप्लाई: पुस्तकों के कारोबार को आगे बढ़ाते हुए सेंट्रल बुक हाउस के वैभव तिवारी ने गीडा में कापियों की बड़ी फैक्ट्री खोली है। जर्मनी की मशीनों से तैयार हो रही कापियों की सप्लाई पूरे पूर्वांचल में है। वहीं बालाजी बुक डिपो के मनोज टिबड़ेवाल ने भी कापियों की फैक्ट्री खोली है। कारोबारी गिरीश चौबे बताते हैं कि गोरखपुर में करीब 30 फीसदी मांग स्थानीय फैक्ट्रियों से पूरी हो रही है।
टेक्स्ट बुक की बिक्री आधे से भी कम रह गई
बक्शीपुर की पुस्तक मंडी में कभी कक्षा एक से लेकर विश्वविद्यालय और टेक्निकल यूनिवर्सिटी के साथ ही बीआरडी मेडिकल कॉलेज के छात्रों के लिए टेक्स्ट बुक की मांग रहती थी। लेकिन ऑनलाइन के दौर के साथ ही खास वर्ग में सिर्फ कोर्स पूरा करने के जतन के चलते टेक्स्ट बुक की मांग आधे से भी कम रह गई है। पुराने कारोबारी श्रीप्रकाश सिंह अनिल का कहना है कि इंटर तक के टेक्स्ट की खूब मांग रहती थी। यूनिवर्सिटी के छात्र में साहित्य से लेकर गणित के टेक्स्ट बुक खरीदते थे। लेकिन अब सारा कुछ गाइड में समाहित हो गए हैं। ऐसे में मंडी का कारोबार आधे से भी कम हो गया है। दुकानें भी कम हो रही हैं।
युवाओं ने पब्लिकेशन और कॉपियों की फैक्ट्रियां खोलीं
पुस्तक मंडी की रौनक भले ही कम हो रही हो लेकिन कुछ युवाओं ने कारोबार में नया कर मुकाम भी हासिल किया है। युवा सौरभ सिंह परिवार की विरासत को आगे बढ़ाते हुए पब्लिकेशन हाउस खोल लिया है। वर्ष 2015 में शुरू हुए डिस्काउंट ग्रुप ऑफ पब्लिकेशन द्वारा 200 से अधिक किताबों का प्रकाशन हो चुका है। इसमें गोरखपुर विवि के प्रोफेसरों की कई किताबें हैं। वहीं पब्लिकेशन द्वारा कालजयी रचनाकार मुंशी प्रेमचंद की किताबों की नई श्रृंखला भी प्रकाशित की है। सौरभ बताते हैं कि गोरखपुर के लेखकों को प्लेटफार्म देने की मंशा से पब्लिकेशन शुरू किया है। अभी तक का रिस्पांस काफी अच्छा है। बक्शीपुर के कारोबारियों द्वारा राजेन्द्रा पब्लिकेशन और यूपीएच पेपर की श्रृंखला भी प्रकाशित हो रही है। वंदना प्रकाशन गणित की किताबें प्रकाशित कर रहा है।
शिकायतें
बक्शीपुर चौराहे से लेकर नखास और आर्य नगर जाने वाली सड़क के बीच एक भी यूरिनल नहीं है। इससे कारोबारियों के साथ महिलाओं को दिक्कत होती है।
गर्मियों के मौसम में सर्वाधिक दिक्कत शुद्ध पेयजल की है। निगम की सार्वजनिक टोटी में या तो पानी नहीं है, या लोगों ने तोड़ दी है।
पूर्वांचल की सबसे बड़ी पुस्तक मंडी में आधा दर्जन कॉम्प्लेक्स बने हैं। लेकिन पार्किंग की व्यवस्था नहीं होने से ट्रैफिक जाम से जूझना पड़ता है।
बिजली निगम ने तारों का संजाल खत्म करने के लिए अंडरग्राउंड केबल बिछा दिया है, लेकिन पुराने तार जस के तस दिखते हैं।
स्कूलों से लेकर विश्वविद्यालयों में शिक्षा के नये पैटर्न से किताबों की मांग खत्म हो रही है।
सुझाव
मंडी में एक यूनिनल अनिवार्य रूप से बनाया जाए। इसके साथ ही महिलाओं की सहूलियत को देखते हुए पिंक यूरिनल की भी व्यवस्था होनी चाहिए।
जलकल को पुस्तक मंडी में सार्वजनिक वाटर पोस्ट की व्यवस्था करनी चाहिए। खराब टोटियों को ठीक करने की जरूरत है।
नगर निगम मंडी में सार्वजनिक पार्किंग की व्यवस्था करे। जिन कॉम्प्लेक्स में पार्किंग के स्थान चिन्हित हो उसे सार्वजनिक करने की जरूरत है।
बिजली निगम को चाहिए कि जो तार बेमतलब के हैं, उसे हटाए। तभी अंडरग्राउंड केबल की सार्थकता दिखेगी।
स्कूलों से लेकर विश्वविद्यालयों में बच्चे किताबों से पढ़ाई करें, इसके लिए संवाद होना चाहिए।
बोले कारोबारी
रोज बदलती हुई शिक्षा प्रणाली ने विद्यार्थी व शिक्षक दोनों को किताबों से दूर कर दिया है। शिक्षार्थी छोड़िए शिक्षकों को भी रोज बदल रहे पाठ्यक्रम का पता नहीं रहता।
-श्रीप्रकाश सिंह ‘अनिल
बाजार में यूरिनल व पार्किंग की सुविधा नहीं है। आए दिन जाम का सामना करना पड़ता है दुकानें छोड़ कर हम पेशाब करने किधर जाए समझ नहीं आता।
-ओम चौबे
ये हमारा दुर्भाग्य है कि इस दौर में लोग किताबों से ज्यादा क्यूशचन बैंक की तरफ भाग रहे। लोग भूल रहे हैं कि ज्ञान किताब के अध्ययन से ही मिलेगा।
-राजेंद्र कुमार
वो अलग समय था जब स्कूल खुलने के साथ ही बच्चों और अभिभावकों में होड़ लगी रहती थी। इस दौर में लोगों को किताब खरीदने की टेंशन नहीं दिखती।
-रमेश अग्रवाल
शिक्षा का स्तर बदल रहा, कैसे मान लिया जाए! आज के समय में रिफरेन्स बुक की सेल बहुत कम हो चुकी है। किताबों की सेल महज पचीस फीसदी रह गई है।
-मनोज कुमार
किसी तरह से परीक्षा पास होने की रेस में बच्चे ज्ञान के पीछे नहीं जा रहे। कुमार मित्तल की भौतिक व पी एन शर्मा रसायन की एक्का-दुक्का किताबें ही बिक रहीं।
-गिरीश चौबे
पाठ्यक्रम में रोज के बदलाव ने धंधा जमीन पर लाकर रख दिया है। सामग्रियों की ऑनलाइन उपलब्धता के कारण बाजार अब खत्म होने की ंकगार पर है।
-संदीप कुमार चौरसिया
किताबों से दूरी ने बच्चों के मानसिक व शारीरिक विकास को प्रभावित किया है। इस कारण बच्चों में जल्द ही डिप्रेशन व कम सहन शक्ति जैसी शिकायत आ रही।
-वीरेंद्र अग्रवाल
हमें जिस हिसाब का टैक्स देना पड़ रहा है वैसी आमदनी नहीं हो पा रही, ऐसे में क्या किया जाए! किताबों की बिक्री न होने से पड़ा हुआ माल रद्दी हो जा रहा है।
-अमरनाथ अग्रवाल
पहले की व्यवस्था ज्यादा बेहतर थी, अब न बच्चे पढ़ना चाह रहे और न अध्यापक पढ़ाना चाह रहे। पहले दुकानों पर चहल-पहल थी, बाजार हमेशा भरा रहता था।
-जहीरुद्दीन
काम में आई भारी गिरावट से व्यापारी नए विकल्प तलाश रहे हैं। अगर कमाई ही नहीं होगी तो रोजमर्रा की जरूरतें प्रभावित होंगी। परिवार के लिए पैसा जरूरी है।
-अनिल बांगड़ी
जैसा चल रहा है अगर वैसा ही रहा तो वो दिन दूर नहीं कि हम समाज कि बजाए कम्प्यूटर में रहने लगे। हमें समझना होगा कि कंप्यूटर और मोबाइल से बाहर भी दुनिया है।
-कल्पना
बोले जिम्मेदार
ऑनलाइन प्लेटफॉर्म कभी भी क्लास रूम के बराबर प्रभावी शिक्षक के माध्यम नहीं हो सकते हैं। वह एक विकल्प है। शिक्षक की तरह ही अच्छी और स्तरीय किताबें भी विद्यार्थी के लिए जरूरी है। मैंने खुद ऑनलाइन पढ़ाने का विकल्प चुना है। अब कक्षाओं में पढ़ाई बहुत कम हो रही है, परिसरों को उत्सव धर्मी बना दिया गया हैं। कक्षाएं नहीं होंगी तो किताबों की बिक्री प्रभावित होगी।
-प्रो.चन्द्र भूषण अंकुर, सेवानिवृत्त विभागाध्यक्ष, इतिहास विभाग, डीडीयू
स्मार्ट सिटी परियोजना के तहत नए सिरे से कई काम शहरी इलाके में होने हैं। इसके लिए शासन से अनुमति भी मिल गई है। बक्शीपुर क्षेत्र में भी अंडरग्राउंड तार कराए जाएंगे। वहीं जहां-जहां घनी आबादी है वहां पर तारों का जंजाल हटाया जाएगा। ट्रांसफार्मर का घेराव कराते हुए सुरक्षित कराया जाएगा। जिन इलाकों में तार टूटने की दिक्कत है, वहां अभी से जांच कर तार भी बदलवाएं जा रहे हैं।
-लोकेंद्र बहादुर सिंह, अधीक्षण अभियंता, शहर
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