बोले इटावा: प्रतिभा को मंच मिले तो हम भी बॉलीवुड में बिखेर सकते हैं चमक
Etawah-auraiya News - बोले इटावा: प्रतिभा को मंच मिले तो हम भी बॉलीवुड में बिखेर सकते हैं चमक
संसाधन और मंच न मिलने से रंगमंच की विधा पर ग्रहण लग रहा है। रंगकर्मियों का कहना है कि आज के बदले दौर में उनकी उम्मीदें धूमिल हो चुकी हैं। इसका खोया दौर वापस लाने के लिए ‘संजीवनी की जरूरत है। सबसे पहला काम इटावा में एक प्रेक्षागृह बनवाना होगा। आपके अपने अखबार ‘हिन्दुस्तान से बातचीत में यह दर्द रंगकर्मियों ने साझा किया। रंगकर्मी आकाश दीक्षित ने कहा कि अगर रंगमंच को सुविधाएं नहीं मिलीं तो इसका रंग पूरी तरह से फीका पड़ जाएगा। रंगकर्मी और कई फिल्मों में अभिनय कर चुके कलाकार रामजनम सिंह का कहना है कि जिले में एक प्रेक्षागृह रंगकर्मियों के लिए नि:शुल्क हो जाए तो रंगमंच नई ऊंचाईयां छू सकता है। रंगमंच को बढ़ावा देने और रंगकर्मियों को प्रशिक्षित करने के लिए आज तक जिले में किसी संस्था की शुरुआत नहीं हो सकी। आज शहर के रंगकर्मी, रंगकर्म को धर्म समझकर अपना शत-प्रतिशत देने के लिए तैयार हैं, लेकिन दें तो किसके बलबूते, न तो पूर्वाभ्यास का कोई स्थान है, न मंचन की सहूलियत और न ही कहीं से मदद। रंगकर्मियों ने कहा कि प्रशासन ने रंगकर्म के लिए कोई काम नहीं किया। जबकि अन्य जनपदों में रंगमंच के लिए नि:शुल्क प्रेक्षागृह और हॉल भी उपलब्ध हैं।
जिला प्रशासन और रंगकर्मियों के साझा प्रयास हों तो वो दौर फिर लौट सकता है। बैठने, अभ्यास करने की जगह मिल जाए। कलाकार एकत्र होंगे, विचार-विमर्श होगा तो सुनहरा दौर लौटते देर नहीं लगेगी। रंग कर्मियों के लिए जनप्रतिनिधि अपनी निधि से भवन व हॉल बनवाएं।
रविंद्र चौहान कहते हैं कि रंगमंच से निकलकर फिल्मों में सफल होने वाले कलाकारों का लंबा इतिहास है, लेकिन यह बात जनपद पर लागू नहीं होती है। यहां के चंद लोग ही उस फेहरिस्त का हिस्सा हो पाए हैं। रंगकर्मी और टीवी कलाकार मुरसलीन खान कहते हैं कि जिले में सबसे बड़ी समस्या थियेटर की है। हमारे पास ऐसी जगह नहीं है कि जहां कम खर्च में नाटक कर सकें। मौकों और संसाधनों का अभाव : यश कश्यप और वरिष्ठ रंग कर्मी डॉ. सतीश कुमार ने कहा कि शहर में संसाधनों का अभाव है। रंगकर्मी अपने अभिनय करने के लिए लखनऊ, दिल्ली, मुंबई जैसे महानगरों का रुख करने को मजबूर होते हैं। आज कलाकार तो हैं, पर कद्रदान नदारद हैं। अभिनय की जीवंत विधा रंगमंच को बचाने के लिए जिम्मेदार भी गंभीर नहीं हैं। साल 2006 में आखिरी बार हुआ था नाटक : वर्ष 1944 में जगदीश विजय नाटक क्लब की शुरुआत हुई, उस समय संस्था में 30 रंगकर्मी थे। 1980 में 60 रंगकर्मी संस्था से जुड़े। 1989 में करीब सौ रंगकर्मी संस्था से जुड़े और कई नाटकों की प्रस्तुति में साथ दिखे। इसके बाद रंगमंच धीरे-धीरे पिछड़ता चला गया। वर्ष 2006 में तत्कालीन मैनेजर स्व. मदन मोहन वर्मा के निर्देशन में अंतिम बार नाटक की प्रस्तुति हुईं। पर्शियन पद्धति के नाटक का मंचन होता था: होली पर शहर के पुरबिया टोला तलेया मैदान में पांच से सात दिन तक देश के दूसरे पर्शियन पद्धति के नाटक का मंचन स्थानीय रंगकर्मी करते थे। इन नाटकों से मिली पहचान: मुरली मनोहर, ईश्वर भक्ति, भयंकर भूल, मुगले आजम, भयंकर भूत, पोरस सिंकदर, वीर क्षत्रशाल, महाराणा प्रताप जैसे कई नाटकों के मंचन से इटावा के रंगकर्मियों को विशेष पहचान मिली। सिर्फ काबिल लोगों को ही मिले अनुमति: नाट्य प्रशिक्षक शाहनवाज खान ने बताया कि जो लोग किसी लाइन में खप नहीं पा रहे हैं, वे नाटक में घुस गए हैं। कोई अभिनय सिखा रहा तो कोई आवाज का प्रशिक्षण दे रहा है। हकीकत यह है कि वे खुद कुछ नहीं कर सके हैं, लेकिन खुद को महारथी समझते हैं। ऐसे लोगों पर लगाम लगनी चाहिए। सरकार की ओर से परमिट मिलना चाहिए। एक प्रमाणन प्रणाली लागू की जानी चाहिए।
स्थान के अभाव में निखर नहीं पा रही प्रतिभा: युवा रंगकर्मी आकाश दीक्षित व आराध्या भदौरिया ने बताया कि जिले में नाटक के लिए प्रेक्षागृह की कमी सबसे गंभीर समस्या है। केवल निजी स्कूलों के पास ही प्रेक्षागृह है। रंगकर्मियों के लिए नि:शुल्क या फिर थोड़ा बहुत किराये पर इसकी उपलब्धता होनी चाहिए।
कलाकारों को एकजुट होने की जरूरत
रविन्द्र चौहान ने बताया कि कलाकारों को एकजुट होने की जरूरत है। प्रशिक्षण की व्यवस्था भी सरकारी स्तर से होनी चाहिए। पहले नाटकों में इस कदर भीड़ जुटती थी कि उसको संभालना मुश्किल हो जाता था। अब समय के साथ बदलाव आया है वह भी चिंताजनक है। वर्तमान में जो स्थिति पलटी है उसके लिए आधुनिकता भी कम जिम्मेदार नहीं है। प्रशिक्षण देने के लिए अकादमी का होना बहुत जरूरी है। इससे अभिनय के क्षेत्र में आगे आने वाले युवा रंगमंच से अपने करियर की शुरुआत कर सकते हैं। यश ने कहा कि रंगमंच के कलाकार फिल्मों और धारावाहिकों में सफल नहीं हो पा रहे हैं तो उसकी बड़ी वजह रंगमंच और सिनेमा में तकनीक की दृष्टि से बहुत अंतर है।
कलाकारों की समस्याओं का होगा समाधान
रंग कर्मियों के लिए विशेष तौर पर व्यवस्थाओं को दुरुस्त करते हुए जल्द ही उच्च अधिकारियों के सहयोग से नई व्यवस्था को लेकर बातचीत की जाएगी और उनकी समस्याओं का समाधान किया जाएगा। - मोहित सिंह, सचिव जिला पर्यटन एवं संस्कृति परिषद
नए युवक कलाकार इस क्षेत्र में आगे आए इसके लिए समय रहते सभी रंग कर्मियों का मानदेय तय किया जाए।
- श्रृष्टि
रंग कर्मियों के लिए एक व्यवस्थित स्थान होना चाहिए जहां वह पूर्वा अभ्यास और मंचन कर सकें ।
-शैफाली यादव
प्रोत्साहन के साथ ही योजनाओं के माध्यम से रंगकर्मियों को प्रोत्साहित किया करें तभी यह विधा जीवंत रहेगी।
- यश कश्यप
कई वरिष्ठ रंगकर्मी भुखमरी के कगार पर हैं आर्थिक मदद के लिए प्रशासन को आगे आना चाहिए।
- संजीव यादव
जेब से खर्च कर कब तक नाटक करेंगे जिले के रंग कर्मियों की सहायता हो इस पर विचार किया जाए।
- शाहनवाज
रिहर्सल न होने से समय पर न तो कलाकार निकल रहे हैं और न ही रंगमंच को बढ़ावा मिल रहा है।
- डॉ. सतीश
रंगमंच के लिए जिले में व्यवस्था की जानी चाहिए अभ्यास के लिए सोचना पड़ता है। स्कूल तो कभी किसी संस्था का दरवाजा खटखटाते हैं।
- विपुल
कोर्स में नाटक का समावेश हो अभिनय एक देवीय कृपा है जिससे प्रशिक्षण से और निखारा जा सकता है, इसके लिए व्यवस्था हो।
- आकाश दीक्षित
रंगमंच कर्मियों को प्रोत्साहन मिले। रिहर्सल और नाटक कार्यक्रमों के लिए प्रेक्षागार की व्यवस्था हो।
- रामजनम सिंह, सदस्य स्टेट रिसोर्स ग्रुप
कला, साहित्य और रुपहरे पर्दे पर यहां के लोगों ने अपनी प्रतिभा का लोहा देश में मनवाया है।
- धीरेन्द्र राव चौबे, फ़िल्म निर्माता/ निदेशक
प्रशासन की अनदेखी के कारण रंग मंच की विधा धीरे-धीरे समाप्त हो रही है।
- रविंद्र चौहान, संस्थापक, पचनद फ़िल्म फेस्टिवल
सुझाव
रंगमंच कर्मियों को प्रोत्साहन मिले इसके लिए रिहर्सल और नाट्य कार्यक्रमों के लिए प्रेक्षागार की व्यवस्था हो।
नामचीन रंग कर्मियों की सूची सार्वजनिक कर सम्मानित किया जाए। रंगमंच को बढ़ावा देने के लिए विद्यालयों में इसकी जानकारी दी जाए।
सरकारी कार्यक्रमों में प्राथमिकता से रंगकर्मियों को आमंत्रित किया जाए।
नाटक से जुड़े लोगों की समस्याओं को प्राथमिकता से समाधान किया जाए।
रंगमंच कर्मियों का संगठन बनाकर उनके माध्यम से जरूरी संसाधन जुटाने के प्रशासन कों पहल करनी चाहिए।
समस्या
प्रशासन ने रंगमंच के लिए ना अकादमी बनाई व ना अभ्यास के लिए कोई व्यवस्था की।
रंगमंच को बढ़ावा देने का प्रयास नहीं हुआ जिले में एक भी प्रेक्षागृह उपलब्ध नहीं है।
जो मंच है वह निजी स्कूलों के पास है जों निशुल्क नहीं है मजबूरी में गेस्ट हाउस या खुले में अभिनय सिखाना पड़ता है।
रंगमंच की नामचीन हस्तियों को नजरअंदाज किया जा रहा है सरकारी कार्यक्रम में नाटक मंचन को समाप्त कर दिया गया।
जिले में रिहर्सल और नाटक के लिए कोई स्थान नहीं है। इटावा महोत्सव या इटावा क्लब की ओर से भी इसके लिए आज तक प्रयास नहीं हुआ।
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