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बोले बांदा:टॉयलेट तक नहीं मयस्सर... किससे कहें व्यथा

Banda News - कामकाजी महिलाओं ने कार्यस्थल पर उनके सामने आने वाले कड़वे अनुभव साझा किए। उन्होंने कहा कि उन्हें आधी आबादी का दर्जा तो मिला है, लेकिन उन्हें सुविधाओं की कमी और मानसिक दबाव का सामना करना पड़ता है।...

Newswrap हिन्दुस्तान, बांदाThu, 27 Feb 2025 09:15 AM
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बोले बांदा:टॉयलेट तक नहीं मयस्सर... किससे कहें व्यथा

बांदा। जरा से ख्वाब क्या देखे कि यह अंजाम कर डाला, मेरी आंखों को दुनिया ने छलकता जाम कर डाला। महिलाएं मोहताज नहीं किसी गुलाब की, खुद बागवान हैं इस कायनात की। मुझे ऐतराज है, आजादी देने का दम भरनेवालों से, आखिर तुम्हे अधिकार किसने दिया हमें आजादी देने का। इन पंक्तियों के साथ कामकाजी महिलाओं ने घर से कार्यस्थल तक पेश आने वाले रोजमर्रा के कड़वे अनुभव आपके अपने अखबार ‘हिन्दुस्तान से साझा किए। स्वाती, अनामिका समेत शहर के हार्पर क्लब में जुटीं जिले की कामकाजी महिलाओं ने साफ तौर पर कहा कि हमें आधी आबादी का सिर्फ दर्जा ही मिला है हकीकत इससे कहीं अलग है। पुरुष प्रधान समाज की सोच आज भी दकियानूसी ही है। चौक चौराहों पर एक तो महिला टॉयलेट नहीं हैं ऊपर से जहां हैं भी वहां पुरुषों ने उजाड़ रखा है। इन टॉयलेट के आसपास इसी समाज के लोग इतनी गंदगी फैला देते हैं कि हमारे लिए वहां जाने की जगह ही नहीं बचती। इसके अलावा कार्यस्थल पर मानसिक दबाव बना रहता है इसका हमारे काम पर भी प्रभाव पड़ता है। हम अपनी बात कहें भी तो किससे। रही बात कार्यस्थल पर महिलाओं से जुड़ी व्यवस्थाओं की तो ज्यादातर सरकारी विभागों में महिलाओं के लिए अलग प्रसाधन (टॉयलेट-शौचालय) तक नहीं हैं। जहां बने भी हैं, वहां बेरोकटोक पुरुष कर्मचारी भी जाते हैं।

जहां सबसे ज्यादा जरूरत, वहां पिंक टॉयलेट नहीं: कामकाजी महिलाओं ने कहा कि मर्दननाका, महेश्वरी देवी, चौक बाजार, शंकरगुरु चौराहा, छावन रोड, बलखंडीनाका आदि क्षेत्र में बाजार लगते हैं, लेकिन यहां महिलाओं के लिए टॉयलेट तक नहीं हैं। यह कामकाजी ही नहीं, बाजार जाने वाली आम महिलाओं की जरूरत और शिकायत है। इस पर प्रशासन को पहल करनी चाहिए। कहा कि बस अड्डे और रेलवे स्टेशन पर रोजाना हजारों मुसाफिर आते-जाते हैं, महिलाएं भी होती हैं। दोनों जगह पर महिलाओं के लिए अलग टॉयलेट की नितांत जरूरत है।

कहने को पिंक टॉयलेट, संचालित करते पुरुष:नगर पालिका बांदा क्षेत्र में तीन पिंक टॉयलेट हैं। एक संकटमोचन मंदिर, दूसरा अवस्थी पार्क और तीसरा राजकीय महिला डिग्री कॉलेज परिसर में बना है। महिला डिग्री कॉलेज परिसर में बना पिंक टॉयलेट आम महिलाओं के बजाए कॉलेज के ही उपयोग में आता है। सार्वजनिक स्थान बने शेष दो पिंक टॉयलेट का संचालन पुरुष ही करते हैं। नाम दिया गया है पिंक टॉयलेट। वहां जाने में महिलाओं को हिचकिचाहट महसूस होती है।

सबको पता, दबा दी गई पीड़िता की आवाज: एक कामकाजी महिला ने आवाज बुलंद कर कहा, जिला अस्पताल का प्रकरण सबको पता है। शराब के नशे में जनपद के एक सियासी दिग्गज ने स्टाफ नर्स से अभद्रता की थी। आलाधिकारियों तक भी यह बात पहुंची थी पर कुछ न हुआ। अंतत: पीड़िता की ही आवाज दबा दी गई। यही स्थिति ज्यादातर विभाग और संस्थानों में है।

बोलीं महिलाएं

विशेष अवकश होने चाहिए, ताकि परिवार और कार्यक्षेत्र में संतुलन बना सकें। तय अवकाश भी नहीं मिलते।

-किरण सेठ

परिवार-कार्यक्षेत्र का दबाव रहता है। मानसिक और शरीरिक स्वास्थ्य प्रभावित होता है। पांच दिन कार्य दिवस ठीक है।

-नीलू सिंह

बाजारों में भी महिलाओं के लिए अलग टॉयलेट नहीं हैं। आम महिलाओं की इस शिकायत पर गंभीरता से पहल जरूरी है।

-अनामिका

संघर्ष से एक मुकाम पर तो पहुंच गए हैं,पर कार्यस्थल व परिवार में संतुलन की जद्दोजहद कहीं अधिक तनाव देती है। -स्वाती सिंह

बोले जिम्मेदार

एडीएम वित्त एवं राजस्व राजेश कुमार कहते हैं किजनपद में किसी भी विभाग में कार्यरत महिलाओं को कोई भी शिकायत या समस्या है तो वह सीधे आकर बता सकती हैं। शिकातय लेकर आने वाली महिलाओं की पहचान पूरी तरह गुप्त रखते हुए संबंधित विभाग के दोषियों पर सख्त कार्रवाई की जाएगी। इस मामले में कोई भी मनमानी नहीं चलने दी जाएगी।

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