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बोले बांदा: गांव के टॉपर थे..अब परिवार पालना भी मुश्किल

Banda News - बांदा के शिक्षामित्र बच्चों को नैतिकता और अनुशासन सिखाते हैं, लेकिन खुद बुनियादी सुविधाओं के अभाव में जी रहे हैं। सरकारी स्कूलों में बिजली, पानी और सड़क जैसी सुविधाएं नहीं हैं, जिससे उनके परिवार की...

Newswrap हिन्दुस्तान, बांदाThu, 27 Feb 2025 05:52 PM
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बोले बांदा: गांव के टॉपर थे..अब परिवार पालना भी मुश्किल

बांदा। बच्चों को नैतिकता-अनुशासन सिखाते हैं। उज्ज्वल भविष्य के सपने दिखा रहे हैं लेकिन खुद अंधेरे में जी रहे हैं। बुनियादी जरूरतों के लिए जूझ रहे हैं। सरकारी स्कूलों में बिजली, पानी और सड़क जैसी सुविधाओं के अभाव का खामियाजा भुगतना पड़ता है। सुविधाओं की बात करें तो साफ पानी तक मयस्सर नहीं है। काम के बदले दाम भी इतना कम है कि सामान्य जरूरतें तक पूरी नहीं होतीं। काम इतने लाद दिए गए हैं कि परिवार को समय नहीं दे पाते। आर्थिक हालात ऐसे कि महज 10 हजार मानदेय भी समय पर नहीं मिलता। कई शिक्षामित्र गांव के टॉपर थे, पर अब अपना परिवार तक नहीं पाल पा रहे हैं। यह दुश्वारियां आपके अपने अखबार ‘हिन्दुस्तान से शिक्षामित्रों ने बयां कीं।

सर्वेश शुक्ला और विष्णुकांत त्रिवेदी कहते हैं कि जनपद में 1700 शिक्षामित्र हैं। इनमें एक हजार से अधिक महिलाएं हैं। इनमें भी दो प्रकार के शिक्षामित्र हैं। एक वो, जिनकी नियुक्ति वर्ष 2001 से 2003 के बीच में हुई है। उन्हें परिषदीय शिक्षामित्र कहा जाता है। इन शिक्षामित्रों को विभाग से मानदेय मिलता है। जनपद में परिषदीय शिक्षामित्र करीब 250 हैं। इसके बाद नियुक्त शिक्षामित्र सर्वशिक्षा अभियान (अब समग्र शिक्षा) के अंतर्गत हैं, जिनका मानदेय विश्व बैंक से अनुदान पर मिलता है। दोनों की ग्रांट शासन से अवमुक्त होती है। परिषदीय शिक्षामित्रों के मानदेय को ग्रांट कभी तीन माह की एक साथ आती है तो कभी पांच माह तक नहीं भेजी जाती है। वहीं, समग्र शिक्षा अभियान से जुड़े शिक्षामित्रों की ग्रांट हर माह अवमुक्त होती है। राजेश तिवारी और चन्द्रप्रकाश शुक्ला कहते हैं कि छात्र जीवन में हम लोग अपनें गांवों के टॉपर थे, लेकिन दुर्भाग्य की चोट है कि आज अपना घर भी बमुश्किल चला पा रहे हैं। नियमानुसार हर माह की तीन तारीख तक बीएसए कार्यालय में उपस्थिति और माह की सात तारीख तक शिक्षामित्रों के खाते में मानदेय पहुंचना चाहिए। 25 साल हो गए। कभी भी तय समय पर मानदेय नहीं मिलता है। कभी 10 तारीख तो कभी 15 तारीख तक आता है।

उत्तराखंड में हो सकता है तो प्रदेश में क्यों नहीं: अंकित ने कहा कि उत्तराखंड में शिक्षामित्रों को 35 हजार वेतन कर दिया गया है। जब वहां पर हो सकता है। तब अपने प्रदेश में क्यों नहीं किया जा रहा है जबकि दोनों ही जगह पर एक ही शासनदेश पर शिक्षामित्रों की भर्ती हुई थी।

निरीक्षण में आने वाले अधिकारी हम पर ही गरजे: शिक्षामित्रों ने कहा कि हम शिक्षकों की कमी को पूरा कर रहे हैं फिर भी दोहरी मार पड़ती है। निरीक्षण पर आने वाले अधिकारी हम पर ही गरजते हैं। स्कूल में पढ़ाई, मिड-डे मील और न जाने क्या क्या काम करने के बावजूद उपेक्षा ही मिलती है।

बोले शिक्षा मित्र

शिक्षकों के समान कार्य करते हैं। दोहरा चरित्र नहीं होना चाहिए। हमारी समस्याओं पर विचार किया जाए।-योगेश

जनवरी व जून में 15-15 दिन का मानदेय नहीं मिलता । उधार राशन लेना पड़ता है। -चन्द्रप्रकाश शुक्ला

शिक्षक पात्रता की सभी शर्ते पूरी करते हैं। ऐसे शिक्षामित्रों को चिह्नित कर योग्यता के मुताबिक तैनाती मिले। -संतोष

हम स्कूल का ताला खोलते-बंद करते हैं। फिर भी हमारे साथ अच्छा व्यवहार नहीं होता है। -राजेश तिवारी

बोले जिम्मेदार

बीएसए अव्यक्त राम तिवारी का कहना है कि शिक्षामित्रों का मानदेय स्कूल और बीआरसी से उपस्थिति आने के बाद बनता है। ग्रांट मिलते ही प्रक्रिया पूरी कर मानदेय रिलीज कर दिया जाता है। कोशिश रहती है कि 10 तारीख तक शिक्षामित्रों को मानदेय मिल जाए। अन्य समस्याओं का भी समाधान होगा।

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