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बोले बांदा: हम बहुएं तो मुस्तैद पर बेफिक्री की भेंट चढ़ रहीं हमारी आशाएं

Banda News - बांदा में आशा कार्यकर्ताओं ने मातृ-शिशु स्वास्थ्य में सहयोग करने की जिम्मेदारी का बोझ उठाने के बावजूद सुविधाओं की कमी और सम्मान की कमी की शिकायत की है। प्रसव के दौरान अस्पताल में रात बिताने की...

Newswrap हिन्दुस्तान, बांदाThu, 27 Feb 2025 05:56 PM
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बोले बांदा: हम बहुएं तो मुस्तैद पर बेफिक्री की भेंट चढ़ रहीं हमारी आशाएं

बांदा। मातृ-शिशु दर कम करने, टीकाकरण में सहयोग, टीबी, फाइलेरिया व मलेरिया की दवा खिलाने, महिलाओं को जागरूक करने और स्वास्थ्य विभाग की योजनाओं के सही क्रियान्वयन में हमारी महती भूमिका है। जिम्मेदारियों का बोझ तो खूब लाद दिया गया पर सम्मान और सुविधाओं की बात जब आई तो कोई सुनने वाला नहीं दिखा। यह बात आपके अपने अखबार ‘हिन्दुस्तान से जिले की आशाओं ने कही। विनोद कुमारी और सुमित्रा देवी कहती हैं कि साफ साफ शब्दों में कहें तो हमसे आशाएं तो बहुत की जाती हैं लेकिन सुविधाएं न के बराबर हैं। किसी महिला के प्रसव के दौरान होने वाली दिक्कतों पर कभी किसी ने ध्यान नहीं दिया। जिला अस्पताल में गर्भवती के प्रसव के समय 24 घंटे तक रहना पड़ता है। रात में रुकने के लिए कोई तय स्थान नहीं है। इसलिए सर्दी हो या गर्मी गलियारे में या फिर इधर-उधर टहलकर रात बितानी पड़ती है। हम बहुएं तो हमेशा मुस्तैद रहती हैं पर सुविधाएं न मिलने से हमारी ‘आशाएं बेफिक्री की भेंट चढ़ रहीं हैं। रूढ़िवादी परिवेश से बाहर निकलकर जनहित में स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ तो जरूर गए पर हमें विभाग में ही सम्मान नहीं मिलता है। सोनी देवी और सीमा देवी कहती हैं कि अगर कोई आशा मेडिकल कॉलेज में प्रसूता को लेकर जाती है तो वहां का स्टाफ ठीक से बात तक नहीं करता है। इस वजह से मेडिकल कॉलेज में बहुत कम केस लेकर जाते हैं। जिला अस्पताल में प्रसव पीड़िता को लेकर आते हैं तो मरीज यहां व्याप्त भ्रष्टाचार के शिकार हो जाते हैं। बिना नजराना दिए न तो ठीक से जांचें होती हैं, न ही देखरेख। हम तीमारदारों के गुस्से का शिकार अलग बनते हैं।

एक हजार पर एक आशा की नियुक्ति: आशाओं ने बताया कि वर्तमान में स्वास्थ्य विभाग से हर एक हजार की आबादी में एक आशा जोड़ी गई हैं। पहले चार से पांच हजार आबादी में एक आशा रहती थीं, तब किसी माह में छह तो किसी माह में प्रसव के सात केस एक-एक आशा कराती थीं पर अब बमुश्किल चार केस एक माह में मिल पाते हैं। पारिश्रमिक वही है, जो पहले था। इससे माह में 1600 रुपये से अधिक नहीं बन पाते। वर्ष 2007 में तय पारिश्रमिक आज भी मिल रहा है जबकि महंगाई हर साल बढ़ रही है। इस मुद्दे पर कभी भी कोई बात नहीं होती, कोई कभी नहीं देखता कि हम कैसे और किन हालात में काम कर रहे हैं।

बोलीं आशाएं

मेडिकल कॉलेज में प्रसव पीड़िता को ले जाने पर बाहर कर दिया जाता है। ऐसा गलत बर्ताव होता है। -राजुकमारी देवी

तमाम तरह के कामों में लगाया जाता है लेकिन पारिश्रमिक बढ़ाने पर कभी बात नहीं होती है। -पूजा

गर्भवती के प्रसव के दौरान 24 घंटे साथ रहना होता है। रात में रुकने के लिए कोई तय स्थान नहीं है। -गंगा देवी

प्रोत्साहन राशि के साथ मानदेय भी तय होना चाहिए, ताकि आर्थिक स्थिति में सुधार आ सके।-निशा यादव

बोले जिम्मेदार

सीएमओ डॉ. अनिल कुमार श्रीवास्तव कहते हैं कि इसमें कोई दोराय नहीं है कि आशा बहुएं स्वास्थ्य विभाग की अहम कड़ी हैं। उनकी जो भी समस्याएं होती हैं, उनका तत्परता के साथ निस्तारण किया जाता है। अगर कहीं पर जांच आदि के नाम पर उनके लाए मरीज से रुपये मांगे जाते हैं तो इस बात की वह जानकारी दें। तत्काल मामले की जांच कराकर संबंधित कर्मचारी के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी।

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