World Autism Awareness Day: क्या है ऑटिज्म, बच्चों में टीवी-मोबाइल की लत से बढ़ रही बीमारी; इन लक्षणों से पहचाने
World Autism Awareness Day: मोबाइल, टीवी की लत बच्चों के जीवनशैली कौशल को कम कर रही है। इस लत की वजह से बच्चों को दूसरों से बात करने, बोलचाल में कमी आ रही है। उनका आत्मविश्वास भी प्रभावित हो रहा है। इसके कारण बच्चों की पढ़ाई पर भी असर पड़ रहा है।

मोबाइल, टीवी की लत बच्चों के जीवनशैली कौशल को कम कर रही है। इस लत की वजह से बच्चों को दूसरों से बात करने, बोलचाल में कमी आ रही है। उनका आत्मविश्वास भी प्रभावित हो रहा है। इसके कारण बच्चों की पढ़ाई पर भी असर पड़ रहा है। दिलशाद गार्डन में स्थित दिल्ली नगर निगम के स्वामी दयानंद अस्पताल के जिला शीघ्र हस्तक्षेप केंद्र (डीआईसी) में बच्चों से संबंधित बीमारियों का इलाज होता है। इस केंद्र में बीते एक वर्ष में 50 बच्चों में ऑटिज्म का पता चला है। इनमें मोबाइल, टीवी को काफी ज्यादा देखने वाले 60 फीसदी बच्चों में ऑटिज्म के अधिक लक्षण पाए गए।
अस्पताल के बाल रोग विभाग के अध्यक्ष डॉ सुरेंद्र सिंह बिष्ट ने बताया कि मोबाइल, टीवी की लत के कारण बच्चों का मस्तिष्क प्रभावित हो रहा है। इस कारण इन बच्चों का लोगों व अपनी उम्र के बच्चों से संवाद करने की शैली प्रभावित हो रही है। डीआईसी में बच्चों का विभिन्न खेल गतिविधियों के साथ सामाजिक कौशल के जरिए इलाज कर रहे हैं। इलाज के जरिए बच्चों को मुख्य धारा में वापस लाया जा रहा है। डॉ बिष्ट के साथ क्लीनिकल साइक्लोजिस्ट दीपिका जैन घाई और ऑक्पेशनल थेरेपिस्ट नितिन कुमार काम कर रहे हैं। डॉ दीपिका ने बताया कि सामान्य बच्चों का तीन से चार वर्ष की आयु में नर्सरी में दाखिला हो जाता है। लेकिन ऑटिज्म से ग्रस्त बच्चों का पांच से छह साल की उम्र में नर्सरी में दाखिला सुनिश्चित होता है।
जागरूकता है जरूरी
डॉ सुरेंद्र ने बताया कि राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत स्वामी दयानंद अस्पताल में वर्ष 2023 में डीआईसी की स्थापना हुई थी। इसके जरिए लोगों में ऑटिज्म को लेकर जागरूकता फैला रहे हैं। लोगों को इसे लेकर संवदेन होनी की आवश्यकता है। डीआईसी की स्थापना के दो वर्ष में 45 हजार बच्चों का विभिन्न बीमारियों का इलाज कर चुके हैं। इसमें सेरिबल पाल्सी, सिंड्रोम, सुनने व बोलने की समस्या, ऑटिज्म का इलाज किया है।
योग के जरिए इलाज की तैयारी
डॉ सुरेंद्र ने बताया कि ऑटिज्म से ग्रस्त बच्चों का योग के जरिए भी इलाज करने की तैयारी कर रहे हैं। इसके लिए प्रस्ताव तैयार किया है। साथ ही, ऑटिज्म से ग्रस्त होने वाले बच्चों के अभिभावकों को बच्चों में योग के शिक्षण प्रदान करने के लिए भी बोलते हैं।
अस्पताल में ऐसे करते हैं ऑटिज्म का इलाज
अस्पताल में ऑटिज्म का इलाज कर रही क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ दीपिका जैन घाई ने बताया कि ऑटिज्म के बच्चों को विभिन्न थेरेपी के जरिए चिकित्सा करते हैं। इसमें फिजियो थेरेपी, स्पीच थेरेपी और ऑक्यूपेशन थेरेपी के जरिए इलाज करते हैं। इसमें बच्चों को दूसरे लोगों से संवाद करना सिखाते हैं। इसे कई खेल गतिविधियों के माध्यम से भी उन्हें समझा कर विकसित करते हैं। कुछ कहानियों को समझाकर भी उनकी सोचने व समझने की शक्ति को बेहतर करते हैं। साथ ही उन्हें लोगों से बोलना भी सिखाया जाता है। आंखों से आंख मिलाकर बात करना, लोगों के साथ जुड़ना ये सब प्रशिक्षण दिया जाता है। इसमें ऑटिज्म से ग्रस्त बच्चे का व्यापक मूल्यांकन करते हैं।
क्या है ऑटिज्म
डॉ सुरेंद्र सिंह बिष्ट ने बताया कि ऑटिज्म को मेडिकल भाषा में ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर कहते हैं। यह मस्तिष्क के विकास संबंधित है। इसमें पीड़ित को लोगों से बातचीत करने में, बातचीत करते समय आंखों से आंख मिलाना, पढ़ने-लिखने में परेशानियां आती हैं। पीड़ित शख्स का मस्तिष्क अन्य लोगों की तुलना में अलग तरीके से काम करता है। मेरा मानना है कि ऑटिज्म कोई दिव्यांगता नहीं है, बल्कि यह एक अलग योग्यता है।
नवजात से लेकर 15 वर्ष के बच्चों का इलाज किया
डॉ सुरेंद्र ने बताया कि दो वर्ष की आयु तक एक अनुभवी पेशेवर की तरफ से स्क्रीनिंग टेस्ट व व्यवाहरिकता के जरिए बच्चों में ऑटिज्म की पहचान की जाती है। एक से दो वर्ष तक इसका उपचार शुरू करने के लिए यह आदर्श समय है क्योंकि मस्तिष्क का लगभग 80 फीसदी विकास 36 महीने (तीन वर्ष) में होता है। कई बच्चों में बहुत बड़े होने तक भी ऑटिज्म की पहचान नहीं होती है। हमारे अस्पताल में जन्म लेने वाले बच्चों के साथ-साथ डीआईसी में आने वाले बच्चे और बाल रोग विभाग में आने वाले बच्चों में हम इसकी पहचान करते हैं। इसमें नवजात से लेकर 15 वर्ष तक के बच्चों का इलाज कर रहे हैं।
ऑटिज्म के ये हैं लक्षण
- बात करते समय आंख से आंख नहीं मिलाना
- जब बच्चे को नाम पुकारने पर वह ध्यान नहीं देते हैं
- बोलने की क्षमता के विकास में विलंब होना
- अकेले खेलना पसंद करते हैं और अन्य बच्चों के साथ खेलने में कठिनाई होती है
- अति सक्रियता, आवेगशीलता (लालसा) और दोहराव वाला व्यवहार
- ध्वनि के प्रति अतिसंवेदनशीलता
- सीमित संख्या में चीजों में तीव्र रुचि या ध्यान देने में समस्या
- शारीरिक संपर्क से बचना
- अपनी और दूसरों की भावनाओं को समझने में कठिनाई होती है
- दूसरों के साथ बातचीत जारी रखने की क्षमता में कमी