दिल्ली कोर्ट से मेधा पाटकर को झटका, मानहानि मामले में सजा बरकरार; क्या दी दलील
दिल्ली की एक अदालत ने दिल्ली के उपराज्यपाल विनय कुमार सक्सेना द्वारा दायर आपराधिक मानहानि मामले में 69 साल की सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर को दोषी ठहराने के मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट के आदेश को बरकरार रखा है।

दिल्ली की एक अदालत ने दिल्ली के उपराज्यपाल विनय कुमार सक्सेना द्वारा दायर आपराधिक मानहानि मामले में 69 साल की सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर को दोषी ठहराने के मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट के आदेश को बरकरार रखा है। हालांकि, साकेत कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश विशाल सिंह ने पाटकर की अदालत में शारीरिक उपस्थिति नहीं होने के कारण सजा पर फैसला सुनाने को टाल दिया।
हालांकि जज ने साफ कर दिया कि सजा बढ़ाई नहीं जा सकती क्योंकि दिल्ली पुलिस ने इसके लिए कोई दलील नहीं दी है और वह इसे केवल बरकरार रख सकती है या कम कर सकती है। कोर्ट सजा पर आदेश सुनाने के लिए पाटकर की शारीरिक उपस्थिति की आवश्यकता के तर्कों पर 2 बजे मामले की सुनवाई करेगा।
जज सिंह ने कहा, "अपील खारिज कर दी गई है, दोषसिद्धि बरकरार है लेकिन सजा सुनाए जाने के लिए अपीलकर्ता को व्यक्तिगत रूप से पेश होना होगा। सजा प्राप्त करने के लिए, दोषी को अदालत में उपस्थित होना चाहिए। जो विवादित है वह दोषसिद्धि और सजा का निर्णय है। चूंकि स्टेट ने सजा में वृद्धि के लिए नहीं कहा है, इसलिए वृद्धि का कोई सवाल ही नहीं है लेकिन अधिक से अधिक इसे बरकरार रखा जा सकता है या कम किया जा सकता है।"
इससे पहले 27 मार्च को दिल्ली हाईकोर्ट ने सामाजिक कार्यकर्ता पाटकर की एक याचिका पर दिल्ली के उपराज्यपाल वी के सक्सेना को को नोटिस जारी किया था। पाटकर ने उक्त याचिका में सक्सेना के खिलाफ वर्ष 2000 के अपने मानहानि मामले में नये गवाह से जिरह करने की अनुमति मांगी है। नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेता पाटकर ने सक्सेना के खिलाफ एक मामला दायर किया है। पाटकर ने सक्सेना के खिलाफ उक्त मामला उनके द्वारा गुजरात में एक एनजीओ का नेतृत्व करते हुए कथित तौर पर एक मानहानिकारक विज्ञापन प्रकाशित करने के लिए दायर किया गया है।