जब रातभर आदिवासियों के गांव में पत्नी समेत भटकते रह गए थे PM, सुखाड़ का लेने गए थे जायजा; जानें- किस्सा
राजीव गांधी ने इस बार पत्नी समेत एक आदिवासी गाँव में रात बिताने का फैसला किया। इससे स्थानीय प्रशासन सन्न रह गया था। दरअसल, प्रधानमंत्री अपनी आंखों से आदिवासियों की दुर्दशा देखना चाहते थे।

बात 1987 की है। राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे। उस साल देशभर में भयानक सूखा पड़ा था। देश के 21 राज्य सुखाड़ की त्रासदी झेल रहे थे। मानसून के रूठने से राजस्थान में स्थिति और भयावह हो चली थी। प्रधानमंत्री राजीव गांधी सुखाड़ से पीड़ित राजस्थान के आदिवासियों की दुर्दशा का अपनी आंखों से जायजा लेना चाहते थे। लिहाजा, वह पत्नी सोनिया गांधी के साथ उदयपुर के आदिवासी इलाके पहुंच गए थे।
इससे दो साल पहले भी राजीव और सोनिया गांधी डूंगरपुर के धनोला में आदिवासी बस्तियों का जायजा ले चुके थे। उस दौरान भी सोनिया गांधी उनके साथ थीं। पिछली बार उनके लौटने पर बदइंतजामी की पोल खुली थी। इससे नाराज होकर उन्होंने राज्य के मुख्यमंत्री हरिदेव जोशी को हटवा दिया था।लिहाजा, राजीव गांधी ने इस बार पत्नी समेत एक आदिवासी गाँव में रात बिताने का फैसला किया। इससे स्थानीय प्रशासन सन्न रह गया था। दरअसल, प्रधानमंत्री अपनी आंखों से आदिवासियों की दुर्दशा देखना चाहते थे। उनके साथ तब युवा कांग्रेसी नेता गुलाम नबी आजाद भी थे।
एक मीडिया रिपोर्ट में कहा गया है कि उस रात, जब प्रधानमंत्री राजीव ने उदयपुर के आदिवासी गांव में रहने का फैसला किया था, तब वह पूरी रात सो नहीं सके थे और आदिवासियों का दुख-दर्द जानने के लिए पूरी रात एक घर से दूसरे घर और एक गाँव से दूसरे गाँव जा रहे थे। इस दौरान राजीव और सोनिया को एक आदिवासी झोपड़ी में कपड़े के लंबे टुकड़े से बने अस्थायी झूले पर एक शिशु को झूलते देखा था। बकौल ग्रामीण राजीव और सोनिया गांधी कुछ देर तक उस बच्चे के साथ खेलते रहे थे।
उदयपुर से लौटने के बाद राजीव गांधी ने 1987 में राज्य में पड़े भीषण सूखे से निपटने के लिए आदिवासियों के लिए एक विशेष पैकेज की घोषणा की थी। तब उन्होंने एक आपातकालीन समिति की स्थापना की थी, जिसका अध्यक्ष वो खुद थे। समिति ने सूखा प्रभावित इलाकों की निगरानी और वहां राहत पहुंचाने के लिए लगभग 1.5 अरब डॉलर की लागत से खाद्य वितरण और ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम की घोषणा की थी। पीएम खुद इसकी निगरानी कर रहे थे।
प्रधानमंत्री गांधी को तब इस बात की चिंता थी कि नौकरशाही में बैठे कुछ लोग इस योजना में अड़चनें डाल सकते हैं और उसे बाधित कर सकते हैं। कुछ साल पहले ही प्रधानमंत्री ने लाल किले से अपने पहले भाषण में सत्ता के दलाल शब्द का इस्तेमाल किया था। बता दें कि दो साल पहले भी राजीव ने आदिवासी इलाकों का दौरा किया था। 1985 के इस दौरे में वह दो किलोमीटर तक कीचड़ से सनी सड़क पर पैदल चले थे। उनके साथ कोई सुरक्षाकर्मी नहीं था। उस यात्रा में भी सोनिया उनके साथ थीं।