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बोले हजारीबाग- रेडीमेड कपड़ों के प्रचलन से बढ़ी दर्जी समाज की परेशानी

बोले हजारीबाग हजारीबाग में टेलर के पेशे से जुड़े हजारों कारीगर हैं। कई ऐसे कारीगर हैं, जिन्होंने अपने कौशल से टेलरिंग के क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रगति

Newswrap हिन्दुस्तान, रामगढ़Fri, 21 Feb 2025 02:06 AM
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बोले हजारीबाग- रेडीमेड कपड़ों के प्रचलन से बढ़ी दर्जी समाज की परेशानी

बोले हजारीबाग- रेडीमेड कपड़ों के प्रचलन से बढ़ी दर्जी समाज की परेशानी हजारीबाग में टेलर के पेशे से जुड़े हजारों कारीगर हैं। कई ऐसे कारीगर हैं, जिन्होंने अपने कौशल से टेलरिंग के क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रगति की है। घर मकान बनाने के साथ बाल बच्चों को अच्छी शिक्षा दे रहे हैं। ये वैसे लोग हैं जिनकी खुद की टेलरिंग दुकान है शहर में लेकर सिर्फ ऑर्डर लेते हैं और बाकी काम कारीगरों से कराते हैं। आय कमोवेश ठीक है पर जो कारीगर है जो दूसरे के ऑर्डर पर काम करते हैं के लिए इन दिनों टेलरिंग का व्यवसाय परेशानी सबब बन रहा है। पुरानी दर पर ही सभी काम कर रहे हैं।

हजारीबाग। भगवान मैन बनाते हैं और दर्जी लोगों को जेंटलमैन बनाते हैं। किसी को भी अपनी कला से जेंटल मैन बनाने के फन में माहिर दर्जी इन दिनों परेशानी झेल रहे हैं। इनकी टेलरिंग का कारोबार इन दिनों मंदी के दौर से गुजर रहा है। इसके पीछे जो सबसे बड़ा कारण है वह रेडीमेड के कारोबार का बढ़ना है। शहर में अब रेडीमेड का अच्छा बाजार तैयार हो गया है। ऑफ लाइन से लेकर ऑनलाइन तक यह कारोबार चल पड़ा है। ऐसे में युवा भी इस ओर ही आकर्षित हो रहे हैं। कारोबार मंदा होने से अब सिलाई मशीन की खड़खड़ाना कम हो रहा है। हालांकि दर्जी जी तोड़ मेहनत में जुटे रहते हैं। हाल के वर्षों में रेडीमेड कपड़ों के बढ़ते चलन ने इस व्यवसाय को काफी प्रभावित किया है।

आजकल बाजार में रेडीमेड कपड़ों की भरमार है। ये कपड़े न केवल सस्ते होते हैं, बल्कि विभिन्न डिज़ाइन और साइज़ में भी उपलब्ध होते हैं। जिसके कारण ग्राहकों को कम समय और प्रयास में मनपसंद कपड़े मिल जाते हैं। इस वजह से, लोग अब दर्जी के पास जाकर कपड़े सिलवाने की तुलना में रेडीमेड कपड़े खरीदना अधिक पसंद करते हैं। रेडीमेड कपड़ों के प्रचलन ने दर्जी के व्यवसाय पर कई नकारात्मक प्रभाव डाले हैं। इस कारण उनकी आय में कमी हो गयी है। अब लोग कपड़े सिलवाने के बजाय रेडीमेड कपड़े खरीदने लगे हैं, जिससे दर्जी व्यवसाय की मांग घट गई है। रेडीमेड कपड़ों के सस्ते और आकर्षक विकल्पों के कारण दर्जी व्यवसाय के लिए बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ गई है।

नई पीढ़ी के लोग दर्जी व्यवसाय में रुचि नहीं दिखा रहे हैं, जिससे इस पारंपरिक कौशल के खत्म होने का खतरा मंडरा रहा है। दर्जी व्यवसाय से जुड़े लोगों को नई तकनीक और डिज़ाइन के बारे में प्रशिक्षित किया जाना चाहिए, ताकि वे ग्राहकों की बदलती मांगों को पूरा कर सकें। दर्जी व्यवसाय को बढ़ावा देने के लिए उचित विपणन और प्रचार रणनीतियों का उपयोग किया जाना चाहिए, ताकि लोगों को उनके द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाओं के बारे में पता चले। सरकार को दर्जी व्यवसाय को बढ़ावा देने के लिए आर्थिक और तकनीकी सहायता प्रदान करनी चाहिए।

लोगों को दर्जी व्यवसाय के महत्व और उनके द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाओं के बारे में जागरूक करने के लिए अभियान चलाने की जरूरत महसूस की जा रही है। इस व्यवसाय को बचाने के लिए सभी स्टेक होल्डर को मिलकर प्रयास करने चाहिए। सबसे बड़ी चिंता उनकी मजदूरी दर में इजाफा नहीं हुआ है। हालांकि, 2010 के बाद से उनकी मजदूरी में कोई वृद्धि नहीं हुई है, जबकि सिलाई के दाम बढ़ चुके हैं। टेलर मास्टर जहां 700 से 800 रुपये प्रति परिधान लेते हैं, वहीं कारीगरों को केवल 160 रुपये पैंट और 100 रुपये शर्ट के मिलते हैं। इसके अलावा, बिजली की अनियमित आपूर्ति और सामाजिक सुरक्षा की कमी जैसी समस्याएं भी उनके लिए चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।

हजारीबाग के टेलरिंग कारीगरों को मजदूरी में वृद्धि, नियमित बिजली आपूर्ति, सामाजिक सुरक्षा और रेडीमेड उद्योग के प्रभाव से निपटने के लिए ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है। सरकार और संबंधित संस्थानों को इन कारीगरों की समस्याओं का समाधान करने के लिए आवश्यक प्रयास करने चाहिए, ताकि वे अपने कौशल और परंपरा को बनाए रखते हुए सम्मानजनक जीवन जी सकें।

कारीगरों के लिए कोई सामाजिक सुरक्षा योजनाएं नहीं हैं, जिससे वे आर्थिक असुरक्षा का सामना कर रहे हैं। उचित प्रोत्साहन और आय की कमी के कारण युवा पीढ़ी कारीगरी के पेशे से दूर हो रही है, जिससे पारंपरिक कौशल के ह्रास का खतरा बढ़ रहा है। कारीगरों की कम आय समाज में आर्थिक असमानता को बढ़ावा दे रही है, जिससे पारिवारिक तनाव झेलना पड़ रहा है। कम आय के कारण कारीगरों गरीबी के कारण परिवार की गाड़ी खिंचने में दिक्कत होने लगी है। बच्चों को पढ़ाने में भी परेशानी होती है। खर्च अधिक है आय कम।

इसमें जल्द बदलाव होना चाहिए। रेडीमेड वस्त्र उद्योग के बढ़ते प्रभाव के कारण हस्तनिर्मित कपड़ों की मांग में कमी आई है, जिससे कारीगरों की आय प्रभावित हो रही है।

लाखे गांव ने टेलरिंग के क्षेत्र में बनायी जिलेभर में पहचान

लाखे गांव के कारीगरों ने टेलरिंग के क्षेत्र में अपनी मेहनत और कौशल से देश और दुनिया में पहचान बनाई है। उनकी उत्कृष्ट कारीगरी और समर्पण ने उन्हें विशेष स्थान दिलाया है, लेकिन बिजली और अन्य बुनियादी सुविधाओं की कमी उनके काम में बाधा उत्पन्न कर रही है। बिजली आपूर्ति ग्रामीण क्षेत्र से होती है, जिससे यहां के निवासी बिजली कटौती से परेशान हैं। हजारीबाग के टेलरिंग कारीगरों को मजदूरी में वृद्धि, नियमित बिजली आपूर्ति, सामाजिक सुरक्षा और रेडीमेड उद्योग के प्रभाव से निपटने के लिए ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है। सरकार और संबंधित संस्थानों को इन कारीगरों की समस्याओं का समाधान करने के लिए आवश्यक प्रयास करने चाहिए, ताकि वे अपने कौशल और परंपरा को बनाए रखते हुए सम्मानजनक जीवन जी सकें। टेलर मास्टर जहां 700 से 800 रुपये प्रति परिधान लेते हैं, वहीं कारीगरों को केवल 160 रुपये पैंट और 100 रुपये शर्ट के मिलते हैं।

पीएम विश्वकर्मा योजना से लाभ ले सकते हैं इस पेशे से जुड़े हुए लोग

पीएम विश्वकर्मा के तहत ट्रेनिंग टेलरिंग के लिए अबतक लगभग15,000 आवेदन आए हैं। 60 महिलाओं को प्रशिक्षण मिला है। कौशल सम्मान योजना में प्रशिक्षण उपरांत 06 महिलाओं को ऋण स्वीकृति हुई है। प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम में भी लगभग 30 दर्जी संबंधित कार्य कर रहे लोगों का आवेदन पास हुआ है। बैंक द्वारा आवेदन की जांच की जा रही है। आरसेटी द्वारा भी दर्जी क्राफ्ट में सिलाई का प्रशिक्षण दिया जा रहा है, जिससे महिलाओं का कौशल विकास हो। मालूम हो कि कम आय के कारीगरों के स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। कई कारीगरों की गर्दन झुक गयी, आंखों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। सरकार को कारीगरों की आर्थिक स्थिति में सुधार के लिए उचित नीतियां बनानी चाहिए, जैसे कि न्यूनतम मजदूरी में वृद्धि और महंगाई पर नियंत्रण। परिवार की आय बढ़ाने के लिए कारीगर अपने बच्चों को बाल श्रम में धकेलने को मजबूर हो जाते हैं। शिक्षा और विकास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। 2010 के बाद से कारीगरों की मजदूरी में कोई वृद्धि नहीं हुई है, जबकि जीवन-यापन की लागत में लगातार वृद्धि हो रही है इससे उनकी आर्थिक स्थिति पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है।

इनकी भी सुनिए

टेलरिंग से जुड़े लोगों को अपना व्यापार दुरुस्त करने के लिए लोन दिया जा सकता है। हजारीबाग में पीएमइजीपी के तहत कई लोन दिए गए हैं। इसके लिए जिला उद्योग केंद्र से संपर्क करना होगा। उनकों पीएम मुद्रा लोन और पीएम विश्वकर्मा योजना के तहत भी लोन मिल सकता है। जरूरत है इसके लिए पहल की। सरकार की कई सारी योजनाएं हैं। कोई भी व्यक्ति आवश्यक डॉक्यूमेंट देकर लोन ले सकता है।

-राकेश आजाद, एलडीएम, हजारीबाग

टेलरिंग का व्यापार धीरे धीरे मंदा हो रहा है। हमलोगों के दादा-परदादा से लोग टेलरिंग का काम करते रहे हैं। पहले के मुकाबले अब कारोबार कम जरूर हुआ है। छोटे कारोबारियों पर इसका असर हुआ है। ऐसे में छोटे कारीगरों को प्रोत्साहित करने की जरूरत है। कई लोगों को योजनाओं के बारे में जानकारी नहीं है। उनतक बैंक अथवा उद्योग विभाग के अधिकारियों को पहुंचकर जानकारी देने की इंतजाम होना चाहिए।

-एम अशरफ, मास्टर, टेलर व्यवसाय

क्या कहते हैं लोग

हमारी मजदूरी पिछले 15 वर्षों से नहीं बढ़ी है, जबकि महंगाई लगातार बढ़ रही है। इस दिशा में ध्यान देना जरूरी है। इस दौरान महंगाई कई गुना बढ़ चुकी है। घर का खर्च चलाना मुश्किल होता जा रहा है। कपड़े, धागे, बिजली, मकान का किराया सब कुछ महंगा हो गया है, आय जस की तस है। -मो अतीक

मैं 60 साल से इस पेशे में हूं। काफी बदलाव हुआ है पर अब काम में पुराना मजा नहीं है, समय बदल रहा है। रेडीमेड कपड़े हर जगह उपलब्ध हैं। अब न तो पहले जैसे ग्राहक आते हैं और न ही इस पेशे में उतनी कमाई रह गई है। मेहनत को पहले जितना महत्व दिया जाता था, वैसा अब नहीं रहा। -मो अमीरूद्दीन

रेडीमेड कपड़ों की बढ़ती लोकप्रियता ने हमारे काम को कम कर दिया है। जबकि हमारे काम में गुणवत्ता रहती है। लेकिन रेडीमेड कपड़ों की गुणवत्ता हमारे हाथ से सिले हुए कपड़ों जैसी नहीं होती। हम जो कपड़े तैयार करते हैं, उनमें सिलाई की मजबूती होती है, ग्राहक के नाप के अनुसार फिटिंग होती है। -मो फिरोज

सामाजिक सुरक्षा की कमी के कारण भविष्य अनिश्चित लगता है। इस पर ध्यान देना जरूरी है। सरकार को चाहिए कि हमारे लिए कोई सामाजिक सुरक्षा योजना शुरू करे, जिससे हमारे परिवारों का भविष्य सुरक्षित हो सके। अब इस पेशे को लेकर हमेशा चिंता की लकीर बनी रहती है। -मो कैसर

त्योहारों के दौरान भी हमें काम करना पड़ता है, जबकि अन्य लोग छुट्टी मनाते हैं। यह हमारे काम की मजबूरी है। दिन-रात मेहनत करनी पड़ती है। जब लोग छुट्टियां मनाते हैं, तब हम अपनी सिलाई मशीन के आगे बैठे होते हैं। त्योहारों के समय हमें परिवार के साथ समय बिताने तक का मौका नहीं मिलता। -मो रमीज राजा

बिजली की समस्या के कारण समय पर ऑर्डर पूरा करना मुश्किल हो जाता है। इस पर ध्यान देना जरूरी है। कई बार ग्राहक नाराज हो जाते हैं और हम पर दबाव बढ़ जाता है। रात में भी हमें मोमबत्ती या बैटरी के सहारे काम करना पड़ता है, जिससे आंखों पर भी असर पड़ता है। बिजली से परेशानी होती है। -मो इंजमामुल हक

मजदूरी कम होने के कारण कई कारीगर यह पेशा छोड़ रहे हैं। इसकी प्रतिष्ठा को लौटाना जरूरी है। पहले हमारे काम की इज्जत थी, लेकिन अब लोग दर्जी के काम को पिछड़ा हुआ मानते हैं। अगर हमें सही दाम मिले और हमारे काम की कद्र की जाए, तो लोग फिर से इस पेशे में रुचि लेंगे। -मो कलाम

टेलरिंग के काम में पहले जैसा मजा नहीं है अब प्रतिस्पद्र्धा भी बढ़ गयी है काम में पैसे कम हो गए हैं। बाजार में बड़ी-बड़ी कंपनियां आ गई हैं, जिन्होंने हमारा धंधा छीन लिया है। प्रतिस्पर्धा इतनी बढ़ गई है कि काम के पैसे भी कम हो गए हैं। पहले हम एक जोड़ी कपड़ों से अच्छी कमाई कर लेते थे। -मो जसीम

रेडीमेड कपड़ों के कारण सिला कर कपड़ा पहनने वाले कम हो गए है युवा तो बिल्कुल ही नहीं। युवा बिल्कुल भी सिलवाए हुए कपड़े पहनना पसंद नहीं करते। वे बड़े ब्रांड्स के कपड़ों की तरफ आकर्षित हो रहे हैं, जिससे हमारा काम प्रभावित हो रहा है। यह पेशा खत्म होने के कगार पर है। -मो रियाज

बिजली की अनियमितता से हमारी उत्पादन क्षमता प्रभावित होती है। काम के बीच में ही बिजली चली जाती है, जिससे हमारा समय बर्बाद होता है और ऑर्डर लेट हो जाते हैं। कई बार ग्राहक हम पर भरोसा करना छोड़ देते हैं। साथ ही साथ हम अपने काम को और बेहतर तरीके से कर सकते हैं। -मो नसीम अख्तर

हमलोग लंबे समय से इस काम में सामाजिक सुरक्षा न होने से हमारे परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर है। अगर कभी कोई आपातकालीन स्थिति आ जाए, तो हमें उधार लेने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता। सुधारने के लिए सरकार को हमारे हक में कोई योजना लानी चाहिए। -मो सिराजुद्दीन

बिजली की कटौती के कारण हमें रात में भी काम करना पड़ता है, जिससे स्वास्थ्य पर असर पड़ता है। दिन में बिजली नहीं होती, तो हमें मजबूरी में देर रात तक काम करना पड़ता है, जिससे हमारी सेहत पर बुरा असर पड़ता है। सिरदर्द, आंखों की कमजोरी, और थकान हमारे जीवन का हिस्सा बन चुके हैं। -मो खुर्शीद आलम

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