बोले जमशेदपुर : रेलवे लोको कॉलोनी में समस्याओं का अंबार, नहीं रहना चाहते रेलकर्मी
जमशेदपुर की रेलवे लोको कॉलोनी, जो 100 साल पुरानी है, बुनियादी सुविधाओं के अभाव में जूझ रही है। यहां के लोग जर्जर क्वार्टर, टूटी सड़कें और अस्पताल में डॉक्टरों की कमी जैसी समस्याओं का सामना कर रहे हैं।...
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जमशेदपुर की ऐतिहासिक रेलवे लोको कॉलोनी को बने भले ही 100 साल हो चुके हों, लेकिन यहां रहने वाले लोग बुनियादी सुविधाओं के अभाव में जी रहे हैं। जर्जर क्वार्टर, टूटी सड़कें, जाम पड़ी नालियों और असुरक्षित खेल मैदान की समस्याओं से जूझ रही इस कॉलोनी में अस्पताल तो है, लेकिन डॉक्टर नहीं मिलते। रेलवे की ओर से यहां के कई क्वार्टर को कंडम घोषित कर दिया गया है। इसके बावजूद लोग उसमें रहने को मजबूर हैं। स्थानीय रेलकर्मियों ने अपनी परेशानियां हिंदुस्तान को बताते हुए रेलवे प्रशासन से समाधान की मांग की। लोको कॉलोनी की नींव ब्रिटिश शासन के दौरान रखी गई थी। उस समय कॉलोनी को टाटानगर रेलवे स्टेशन (तब कालीमाटी) के कर्मचारियों के लिए बसाया गया था। मूल रूप से यह कॉलोनी स्टीम लोकोमोटिव चलाने वाले लोको पायलटों के लिए बनाई गई थी। इसलिए इसका नाम लोको कॉलोनी रखा गया। समय के साथ डीजल और इलेक्ट्रिक लोकोमोटिव के आने से कर्मचारियों की संख्या में इजाफा हुआ। कभी यहां चार हजार की संख्या में कर्मचारी और उनके परिजन रहते थे, लेकिन कॉलोनी के क्वार्टरों की संख्या घटती गई और आज यहां लगभग दो हजार के करीब लोग रहते है। कॉलोनी की सबसे जटिल समस्या लोको रेल फाटक है। यह रेल फाटक बंद होने के बाद कभी-कभी एक घंटे तक नहीं खुलता, जिससे राहगीर, कर्मचारी और स्थानीय निवासी फंस जाते हैं। सबसे ज्यादा परेशानी तब होती है, जब एंबुलेंस फाटक में फंस जाती है। कई बार ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं, जहां मरीज समय पर अस्पताल नहीं पहुंच सके और उनकी मौत हो गई। यहां से शहर में जाने का यह एकमात्र रास्ता है। इसके अलावा कोई वैकल्पिक रास्ता नहीं है। स्कूल जाने वाले बच्चे भी इस समस्या से अछूते नहीं हैं। सुबह के समय जब उन्हें स्कूल पहुंचना होता है, तब भी वे अक्सर फाटक में फंसकर लेट हो जाते हैं। यही कारण है कि ऑटो चालक भी लोको कॉलोनी के नाम पर यहां आने से कतराते हैं। रेलवे प्रशासन ने यहां अंडरपास बनाने का कार्य तो शुरू किया है, लेकिन निर्माण कार्य बेहद धीमी गति से चल रहा है, जिससे समस्या का समाधान होता नहीं दिख रहा।
अस्पताल में नहीं हैं डॉक्टर, इलाज के लिए करना पड़ता है संघर्ष
कॉलोनी में एक रेलवे अस्पताल भी मौजूद है, जो कर्मचारियों की सुविधा के लिए ब्रिटिश शासनकाल में ही बनाया गया था। उस वक्त यहां डॉक्टर और नर्स की उचित व्यवस्था थी, लेकिन पिछले तीन साल से किसी डॉक्टर की तैनाती नहीं की गई है। इस कारण कर्मचारियों को इलाज के लिए परसूडीह रेलवे अस्पताल जाना पड़ता है, जिसके लिए उन्हें फाटक पार करना पड़ता है। इमरजेंसी की स्थिति में यह समस्या और गंभीर हो जाती है, क्योंकि फाटक बंद होने से मरीजों को समय पर इलाज नहीं मिल पाता।
पुराने क्वार्टर तोड़े जा रहे, लेकिन नए नहीं बनाए जा रहे
रेलवे लगातार पुराने और जर्जर क्वार्टर को तोड़ने का आदेश जारी कर रहा है, लेकिन नए क्वार्टरों के निर्माण की कोई योजना नहीं है। जो क्वार्टर बचे हैं, वे इतने छोटे हैं कि एक परिवार के लिए पर्याप्त जगह तक नहीं है। कई क्वार्टरों पर अतिक्रमण भी हो चुका है। रेलवे मेंस यूनियन के संयोजक एमके सिंह का कहना है कि अगर रेलवे नई कॉलोनी का निर्माण करता है तो कई कर्मचारियों को क्वार्टर की समस्या से राहत मिल सकती है।
सड़कों की हालत बदतर, नालियों की नहीं होती सफाई
कॉलोनी की सड़कों की स्थिति काफी जर्जर हो चुकी है। यहां के निवासियों को याद भी नहीं कि आखिरी बार सड़क निर्माण कब हुआ था। टूटी-फूटी सड़कों से धूल उड़ती रहती है, जो घरों तक पहुंच जाती है और लोगों के लिए परेशानी का कारण बनती है। रात में स्थिति और खराब हो जाती है, क्योंकि कॉलोनी में स्ट्रीट लाइट तक नहीं है। अंधेरे के कारण चोरी और अन्य अपराध की घटनाएं बढ़ने लगी हैं। नालियों की हालत भी बदतर है। नियमित सफाई नहीं होने के कारण नालियां जाम हो जाती हैं और गंदगी से बीमारियां फैलने का खतरा बना रहता है। कई बार कॉलोनी के लोगों ने इसकी शिकायत की, लेकिन कोई ठोस समाधान नहीं निकला।
खेल मैदान बना असामाजिक तत्वों का अड्डा
लोको कॉलोनी में कभी कर्मचारियों और उनके बच्चों के लिए एक खेल मैदान बनाया गया था। लेकिन आज यह मैदान असामाजिक तत्वों का अड्डा बन चुका है। शाम होते ही यहां शराबखोरी, जुआ और अड्डेबाजी शुरू हो जाती है। स्थानीय लोगों ने कई बार इसका विरोध किया, लेकिन असामाजिक तत्वों से झड़प तक हो चुकी है। स्थिति इतनी बिगड़ चुकी है कि अब कॉलोनी के लोग इस खेल मैदान में अपने बच्चों को भेजने से भी डरते हैं।
अब कॉलेनी में नहीं रहना चाहते कर्मचारी
एक समय था, जब इस कॉलोनी में रहने के लिए रेलकर्मी सिफारिश करवाते थे, लेकिन अब हालात इतने खराब हो चुके हैं कि कोई यहां रहना नहीं चाहता। खासकर जिनके परिवार हैं, वे यहां रहने से बच रहे हैं। कई रेलकर्मी किराए के मकान में शिफ्ट हो चुके हैं, क्योंकि यहां मूलभूत सुविधाओं का घोर अभाव है।
समस्या
- अंडरपास का निर्माण तय समय सीमा पर नहीं हो रहा है, जिससे अब भी परेशानी बनी हुई है।
- सड़कों की स्थिति बदहाल है, सड़कों पर चलने में भी काफी परेशानी होती है।
- हर तरफ गंदगी का अंबार लगा हुआ है, जो बीमारियों को बढ़ावा दे रहा है।
- अस्पताल में डॉक्टरों की तैनाती नहीं है। इमरजेंसी में परसूडीह रेल अस्पताल जाना पड़ता है।
- मैदान में असमाजिक तत्वों का कब्जा रहता है, जिससे बच्चे मैदान में खेलने से कतराते हैं।
सुझाव
- अस्पताल में डॉक्टरों की तैनाती हो, ताकि स्थानीय लोगों को इलाज के लिए इधर-उधर न भटकना पड़े।
- नए क्वार्टरों का निर्माण हो, ताकि कर्मचारियों को रहने के लिए बेहतर सुविधा मिले।
- सड़कों की मरम्मत और स्ट्रीट लाइट की उचित व्यवस्था की जाए।
- नालियों की सफाई नियमित रूप से करवाई जाए।
- खेल मैदान को असामाजिक तत्वों से मुक्त कराया जाए।
कॉलोनी की समस्या को लेकर कई बार संबंधित अधिकारियों को पत्राचार किया जा चुका है। यहां की सबसे बड़ी समस्या अस्पताल में डॉक्टरों का न होना और रेलवे फाटक है। अंडरपास का काम तेजी से हो तो आधी से ज्यादा समस्या दूर हो जाएगी।
एमके सिंह, संयोजक, दक्षिण पूर्व रेलवे मेंस यूनियन
हम रोज लोको फाटक की समस्या से जूझते हैं। कभी-कभी तो एक घंटे तक फाटक नहीं खुलता, जिससे ऑफिस तक पहुंचने में देरी हो जाती है।
एनके शर्मा, ट्रेन मैनेजर
यहां की सड़कों की हालत इतनी खराब है कि पैदल चलना मुश्किल हो गया है। बारिश के दिनों में कीचड़ और गड्ढों से बचना नामुमकिन हो जाता है।
आरके प्रसाद, ट्रेन मैनेजर
रेलवे अस्पताल में डॉक्टर तक नहीं हैं। जब भी बीमार पड़ते हैं तो परसूडीह अस्पताल जाना पड़ता है। कई बार इमरजेंसी में भी इलाज समय पर नहीं मिल पाता।
अंकित कुमार, ट्रेन मैनेजर
कई क्वार्टर इतने जर्जर हो चुके हैं कि कभी भी गिर सकते हैं। हमें डर के साये में जीना पड़ रहा है।
बीआरएम राव उर्फ बाबू, टीआरएस
हम लंबे समय से नए क्वार्टर की मांग कर रहे हैं, लेकिन रेलवे सिर्फ पुराने क्वार्टर तोड़ रहा है, पर नए क्वार्टर नहीं बन रहे हैं।
संजय सिंह
नालियां पूरी तरह से जाम हो चुकी हैं। गंदगी के कारण बीमारियां फैलने लगी हैं। रेलवे प्रशासन को इसकी सफाई करवानी चाहिए।
एसए खान
कॉलोनी की हालत इतनी खराब हो गई है कि कई कर्मचारी किराए के मकान में रह रहे है। यहां बुनियादी सुविधाएं नहीं मिल रही हैं।
एमपी गुप्ता
रात में कॉलोनी में अंधेरा पसरा रहता है, जिससे चोरी और अन्य अपराध बढ़ रहे हैं। प्रशासन को स्ट्रीट लाइट की व्यवस्था करनी चाहिए।
गोविंद राव, ट्रैक मेंटेनर
यहां के अस्पताल में डॉक्टर नहीं हैं। इमरजेंसी की स्थिति में परेशानी का सामना करना पड़ता है।
विजीत कुमार
हमें रेलवे के छोटे के क्वार्टर में रहना पड़ता है, जो सालों पहले बने थे। आज इनकी स्थिति जर्जर हो चुकी है।
कमला करुआ
इन क्वार्टरों में किसी तरह रह रहे है। बड़े परिवार के लिए और भी परेशानी झेलनी पड़ती है।
एम जॉन
मैदान में असामाजिक तत्वों का जमावड़ा लगा रहता है। कई बार तो उनसे झड़प तक हो चुकी है।
राजू कुमार
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