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भक्ति के बिना लक्ष्य प्राप्ति असंभव : स्वामी युगल शरण

भक्ति के बिना लक्ष्य प्राप्ति असंभव : स्वामी युगल शरणभक्ति के बिना लक्ष्य प्राप्ति असंभव : स्वामी युगल शरणभक्ति के बिना लक्ष्य प्राप्ति असंभव : स्वामी युगल शरणभक्ति के बिना लक्ष्य प्राप्ति असंभव :...

Newswrap हिन्दुस्तान, बिहारशरीफFri, 21 Feb 2025 10:39 PM
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भक्ति के बिना लक्ष्य प्राप्ति असंभव : स्वामी युगल शरण

भक्ति के बिना लक्ष्य प्राप्ति असंभव : स्वामी युगल शरण कहा-ईश्वर प्राप्ति के तीन मार्ग-कर्म, ज्ञान और भक्ति आदि शंकराचार्य भी गुप्त रूप से करते थे श्रीकृष्ण की भक्ति भक्ति श्रीकृष्ण की प्रसन्नता के लिए हो, न कि स्वार्थ के लिए निष्कपट प्रेम से ही प्राप्त होती है ईश्वर कृपा फोटो : युगल 01 : बिहारशरीफ के श्रम कल्याण केंद्र में शुक्रवार को आध्यात्मिक प्रवचन देते हुए डॉ. स्वामी युगल शरण। युगल 02 : श्रम कल्याण केंद्र के मैदान में डॉ. स्वामी युगल शरण के प्रवचन में उमड़ी श्रद्धालुओं की भारी भीड़। बिहारशरीफ, हमारे संवाददाता। शहर के श्रम कल्याण केंद्र के मैदान में हो रहे प्रवचन के तेरहवें दिन शुक्रवार को स्वामी युगल शरण ने भक्ति, ज्ञान और कर्म के महत्व पर चर्चा की। उन्होंने बताया कि ईश्वर प्राप्ति के तीन मार्ग होते हैं-कर्म, ज्ञान और भक्ति। कर्म मार्ग अपनाने वाले को कर्मी, ज्ञान मार्ग अपनाने वाले को ज्ञानी और भक्ति मार्ग अपनाने वाले को भक्त कहा जाता है। लेकिन सबसे श्रेष्ठ और अंतिम लक्ष्य तक पहुंचाने वाला मार्ग केवल भक्ति है। उन्होंने बताया कि केवल कर्म करने से कर्मी को और आत्मज्ञान प्राप्त करने से ज्ञानी को उनका लक्ष्य नहीं मिल सकता। लक्ष्य प्राप्ति के लिए भक्ति आवश्यक है। जब कोई व्यक्ति सगुण साकार भगवान की भक्ति करता है, तभी वह कर्मयोगी या ब्रह्मज्ञानी बन सकता है। यही कारण है कि भक्ति को सर्वोपरि माना गया है। उन्होंने आगे बताया कि ब्रह्मानंद का अनुभव करने वाले भी प्रेमानंद के लिए लालायित रहते हैं। ब्रह्मानंद केवल अनुभूति देता है, लेकिन प्रेमानंद के जरिए व्यक्ति अपनी इंद्रियों से भगवान का दर्शन कर सकता है, उनके दिव्य शब्द सुन सकता है, उनकी सुगंध महसूस कर सकता है और उन्हें स्पर्श कर सकता है। प्रेमानंद में रस की विशेषता होती है, इसीलिए ब्रह्मानंद प्राप्त करने वाले भी प्रेमानंद की कामना करते हैं। स्वामी युगल शरण ने कहा कि आदि शंकराचार्य ने जगत में अद्वैतवाद का प्रचार किया, लेकिन वे स्वयं छुपकर श्रीकृष्ण की भक्ति करते थे। उस समय देश की परिस्थिति ऐसी थी कि लोग नास्तिकता की ओर बढ़ रहे थे, कर्मकांड गलत ढंग से किया जा रहा था और वेदों की उपेक्षा हो रही थी। ऐसे में, शंकराचार्य ने समाज को सही दिशा देने के लिए अद्वैतवाद का सिद्धांत रखा, लेकिन वे स्वयं श्रीकृष्ण की भक्ति में लीन रहते थे। उन्होंने वेदों का उल्लेख करते हुए बताया कि ब्रह्माजी ने वेदों को तीन बार मंथन कर यही निष्कर्ष निकाला कि केवल भक्ति ही मोक्ष प्राप्ति का मार्ग है। वेदों के अनुसार, जो व्यक्ति न अधिक आसक्त हो और न अति विरक्त, वही भक्ति का अधिकारी होता है। भक्ति के बिना कोई भी व्यक्ति अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंच सकता। भक्ति के महत्व को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि भक्ति स्वतंत्र और शाश्वत है। कर्म और ज्ञान समय के साथ समाप्त हो सकते हैं, लेकिन भक्ति हमेशा बनी रहती है। यह सबके लिए है और इसे करने के लिए किसी विशेष नियम या योग्यता की आवश्यकता नहीं होती। भक्ति किसी भी जाति, धर्म, वर्ग और परिस्थिति में की जा सकती है। उन्होंने भक्ति की गहराई को समझाते हुए बताया कि भगवान श्रीकृष्ण की अनंत शक्तियों में से एक प्रमुख शक्ति उनकी स्वरूप शक्ति है, जिसे चित् शक्ति भी कहा जाता है। इस चित् शक्ति के तीन रूप होते हैं-सत्, चित् और आनंद। इनमें से आनंद स्वरूप शक्ति से ह्लादिनी शक्ति की उत्पत्ति होती है, जो प्रेम का सार है। यही प्रेम आगे चलकर भक्ति बनता है और भगवान इसी प्रेम भक्ति के अधीन रहते हैं। भक्ति को प्राप्त करने के लिए उन्होंने कहा कि निष्कपट भाव से, बिना किसी स्वार्थ के, सच्चे प्रेम से भक्ति करनी होगी। केवल तपस्या और ज्ञान से प्रेम नहीं मिलता, बल्कि जब भगवान की कृपा होती है, तब यह दिव्य प्रेम, यानी भक्ति, प्राप्त होती है। यह भक्ति साधारण नहीं होती, बल्कि इसे प्राप्त करने के लिए साधना करनी पड़ती है। भक्ति के अलग-अलग स्तरों की व्याख्या करते हुए उन्होंने बताया कि साधना भक्ति, भाव भक्ति, प्रेम भक्ति, स्नेह भक्ति, मान भक्ति, प्रणय भक्ति, राग भक्ति, अनुराग भक्ति, भावावेश भक्ति और महाभाव भक्ति के रूप होते हैं। इनमें साधना भक्ति वह है जिसे हमें करना चाहिए, और शुद्ध भक्ति वह है जिसे हमें प्राप्त करना चाहिए। उन्होंने कहा कि भक्ति को प्राप्त करने के लिए हमें अपने मन और हृदय को तैयार करना होगा। दिव्य प्रेम एक पवित्र वस्तु है, जो अशुद्ध मन में ठहर नहीं सकती। इसलिए साधना भक्ति के माध्यम से अपने अंतःकरण को शुद्ध करना होगा। जब अंतःकरण शुद्ध हो जाएगा, तब गुरु और महापुरुष बिना मांगे ही हमें भक्ति का उपहार देंगे। उन्होंने अंत में समझाया कि सच्ची भक्ति वही होती है, जिसमें कोई अन्य इच्छा न हो। भक्ति केवल श्रीकृष्ण की प्रसन्नता के लिए की जानी चाहिए, न कि किसी स्वार्थ के लिए। जब व्यक्ति इस अवस्था को प्राप्त कर लेता है, तभी उसे सच्ची भक्ति का अनुभव होता है, जो जीवन का अंतिम और सबसे ऊंचा लक्ष्य है। मौके पर बड़ी संख्या में लोग उपस्थित रहे और उनके विचारों को ध्यानपूर्वक सुना।

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