बोले औरंगाबाद : निजी स्कूलों से कॉपी-किताब खरीदने की बाध्यता खत्म हो
जिले में स्टेशनरी दुकानदारों की आमदनी लगातार घट रही है। इंटरनेट और सरकारी योजनाओं ने उनके व्यापार पर विपरीत प्रभाव डाला है। निजी स्कूलों में स्टेशनरी की बिक्री को प्राथमिकता मिलने से दुकानदारों को...
जिले के विभिन्न बाजारों में दर्जनों की संख्या में स्टेशनरी दुकानें संचालित हो रही हैं। इस धंधे से जुड़े लोगों को अब वैसी आमदनी नहीं रह गई है। आमदनी लगातार घट रही है। इंटरनेट के बढ़ते प्रचलन ने उनके कारोबार पर खासा असर डाला है। दुकानदारी प्रभावित हुई जबकि निजी स्कूलों में कॉपी किताब और स्टेशनरी का सामान खरीदने की बाध्यता ने तो उनकी कमर ही तोड़ दी है। इस वजह से उनका कारोबार सिकुड़ता जा रहा है। रही सही कसर जीएसटी से पूरी हो रही है। स्टेशनरी कारोबार से जुड़े लोगों का कहना है कि जांच के नाम पर जब तब उन्हें परेशान किया जाता है। शहर में ट्रांसपोर्टेशन की व्यवस्था भी ठीक नहीं है। इन समस्याओं से वे निजात चाहते हैं। स्टेशनरी कारोबारी गौरव राज, राज किशोर साहू, अमित कुमार, प्रवीण कुमार, नरेंद्र कुमार, लक्ष्मीकांत मिश्रा, मयंक कुमार आदि ने बताया कि स्टेशनरी के सामान में पेंसिल, कटर, स्केल आदि पर अलग-अलग जीएसटी लगने से दिक्कत हो रही है। कारोबारी अपना व्यापार बढ़ाने के लिए स्कीम चलाते हैं। उसमें एक सामान के साथ दूसरा फ्री रहता है लेकिन जब जीएसटी के चलते दिक्कत बढ़ जाती है। स्थानीय थोक कारोबारी जिले के छोटे-बड़े दुकानदारों को सामान को आपूर्ति करते हैं। ज्यादातर दुकानदार अपने क्षेत्र के स्कूल या कॉलेज के पास दुकान चलाते हैं। इन दुकानदारों का काम बहुत बड़ा नहीं होता है लेकिन जीएसटी के अधिकारी उनके यहां भी पहुंच जाते हैं। बिल नहीं होने पर प्रताड़ित करते हैं फिर जहां से ये दुकानदार सामान लेते हैं, उन कारोबारी को भी अधिकारी परेशान करते हैं। स्टेशनरी कारोबारी ने बताया कि जायदातर दुकानें स्कूल, कॉलेज के पास ही होती हैं। एक दौर था जब इन दुकानों पर पूरे दिन छात्र-छात्राओं की भीड़ रहती थी। अब हालात बदल गए हैं। अब स्कूल, कॉलेज के परिसर में ही कॉपी, किताब और स्टेशनरी के सामान बिक रहे हैं। छात्र-छात्राओं को स्कूल से ही कॉपी, किताब लेने के लिए बाध्य किया जाता है। सरकारी और निजी कार्यालय में कंप्यूटर, लैपटॉप, टैबलेट, मोबाइल के बढ़ते उपयोग से भी स्टेशनरी व्यापार को धक्का लगा है। कुछ वर्ष पूर्व तक पेपर और पेन की बहुत ज्यादा मांग रहती थी लेकिन इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स के बढ़ते उपयोग से काफी असर पड़ा है। स्टेशनरी व्यवसाय को सरकारी विभागों से भी बहुत झटका लगता है। उन विभागों में सप्लाई का तुरंत पैसा नहीं मिलता। साल भर तक इंतजार करना पड़ता है। कई बार समान के रेट में पहले की अपेक्षा टैक्स बढ़ने से अंतर आ जाता है। इसे अधिकारियों को समझाने में पसीने छूट जाते हैं। स्टेशनरी कारोबारी ने कहा कि पांच से दस वर्ष पूर्व छात्र-छात्राओं की भीड़ दुकान में सुबह से उमड़ने लगती थी। कोरोना काल में स्टेशनरी कारोबार की कमर टूट गई। ऑनलाइन पढ़ाई से स्टेशनरी का प्रयोग कम होने लगा। किताबों का चलन कम हो गया है। पहले एक ही विषय की अलग-अलग लेखकों की किताबों की मांग रहती थी। अब बच्चे यूट्यूब, ई बुक, पीडीएफ फाइलों से पढ़ाई कर ले रहे हैं। स्टेशनरी कारोबारी को यह भी कहना है कि मोबाइल ऐप के कारण भी किताबों और स्टेशनरी का कार्य प्रभावित हुआ है। ऑनलाइन पढ़ाई होने से बच्चे किताबें खरीदने में रुचि नहीं दिखा रहे हैं। इसके कारण कारोबार मंदी के दौर में फंसा हुआ है। सरकार की ओर से भी कोई सुविधा स्टेशनरी दुकान संचालकों को नहीं दी जाती है। दुकानदारों को काफी परेशानी उठानी पड़ रही है। इससे घर का खर्च निकालना भी मुश्किल हो रहा है। सभी तरह के टैक्स, दुकानों का किराया देना पड़ता है।
सरकारी स्कूलों में बच्चों को मुफ्त में दी जा रही स्टेशनरी किट से दुकानदारों का कारोबार मंदा
स्टेशनरी दुकान संचालकों ने बताया कि शिक्षा विभाग की ओर से बच्चों को कॉपी, स्टेशनरी का मुफ्त किट देने की योजना बेहतर है। यहां पहले से स्कूली बच्चों को साइकिल और पोशाक योजना का लाभ दिया जा रहा है। इन योजनाओं के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में साइकिल और पोशाक की दुकानों को लाभ हो रहा है क्योंकि यह व्यवस्था किसी निजी एजेंसी के टेंडर के माध्यम से नहीं देकर डीबीटी के माध्यम से दी गई है। वह अपने स्थानीय स्तर पर साइकिल और पोशाक की खरीदारी करते हैं। मुफ्त कॉपी, स्टेशनरी योजना को डीबीटी के माध्यम से चलाया जाना चाहिए। इससे राज्य के योजना का लाभ छात्रों के साथ स्थानीय दुकानदारों को मिल सकेगा। दुकानदारों ने बताया कि कॉपी, स्टेशनरी दुकानों से कई लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार भी मिलता था लेकिन कॉपी, स्टेशनरी की मांग कम होने से रोजगार पर भी संकट छा गया है। दुकान का संचालन लागत कम करने के लिए छंटनी तक की जा रही है। सरकार को चाहिए कि छोटे-छोटे स्टेशनरी दुकान संचार को सस्ते दर पर ऋण उपलब्ध कराए और उनके लिए रोजगार का अवसर प्रदान करें। बिहार सरकार द्वारा चलाए जा रहे मुख्यमंत्री उद्यमी योजना का लाभ भी स्टेशनरी दुकान संचालकों को मिलना चाहिए। इस पर सरकार को गंभीरता से लेना चाहिए।
सुझाव
1. मुफ्त कॉपी, स्टेशनरी योजना में स्थानीय कारोबारी को मिले प्राथमिकता।
2. योजना को यदि संचालित करना है तो इसे डीबीटी माध्यम से चलाया जाए।
3. दुकानदारों को सस्ता कर्ज मुहैया कराया जाना चाहिए।
4.कॉफी पर जीएसटी के स्लैब में बदलाव किया जाए।
5. कारोबारी को सरकारी योजना से जोड़ा जाए
शिकायतें
1. कॉफी स्टेशनरी की मांग में लगातार गिरावट से कमाई घट रही है।
2.दुकानदारों के लिए बैंकों और निजी लोगों से लिए कर्ज देने में परेशानी।
3.बिक्री नहीं होने के कारण दुकानों का किराया देने में परेशानी।
4.कॉपी पर 12 प्रतिशत की दर से जीएसटी लगने के कारण महंगा है।
5. ऑनलाइन बाजार के कारण स्टेशनरी कारोबार प्रभावित हुआ है।
हमारी भी सुनिए
स्कूलों में पढ़ने की आदत नहीं डाली जा रही है। इससे पुस्तक और कॉपियों की बिक्री कम हो रही है। व्यवसायी पूंजी लगा कर इसमें फंसे हुए हैं। कारोबार का हाल बुरा है।
संतोष कुमार
ऑनलाइन कारोबार से स्टेशनरी का धंधा प्रभावित हो रहा है। ऑनलाइन कोचिंग का भी असर है। तकनीक ने उनके कारोबार को बुरी तरह प्रभावित किया है। उन्हें कोई सहायता नहीं मिलती है।
रंजन कुमार
प्राइवेट स्कूलों में खुली स्टेशनरी की दुकानों पर रोक न लगने से दुकानदारी पर असर पड़ रहा है। इस तरह की गतिविधि पर रोक लगाई जानी चाहिए।
संजय पांडेय
मुफ्त कॉपी, किताब वितरण करने से दुकानदारों को नुकसान हो रहा है। मोबाइल के बढ़ते प्रचलन से उनका कारोबार प्रभावित हो रहा है। दूसरी तरफ सरकार भी उनकी मदद नहीं करती है।
पिंकेश कुमार
मोबाइल ऐप के कारण भी किताबों व स्टेशनरी का कार्य प्रभावित हुआ है। ऑनलाइन पढ़ाई होने से बच्चे किताबें खरीदने में रुचि नहीं दिखा रहे हैं। सरकारी सहायता नहीं के बराबर मिलती है।
राहुल कुमार
स्टेशनरी दुकान संचालक कोविड के समय से ही जूझ रहे हैं। सरकार को ऐसी रणनीति बनानी चाहिए जिससे दुकानदारों को कुछ राहत मिल सके। टैक्स आदि में छूट मिलनी चाहिए।
मयंक कुमार सिंह
जिले में कॉपी, स्टेशनरी सामान का खुदरा बाजार संकट में है। इससे जुड़े व्यवसाईयों के बारे में भी संबंधित अधिकारियों को सोचना चाहिए। सरकारी विभागों में उन्हें मौका मिलना चाहिए।
विशाल कुमार
दुकानदारों को सस्ता कर्ज मुहैया कराया जाना चाहिए। कॉपी पर जीएसटी के स्लैब में बदलाव किया जाना चाहिए। इसके अलावा सब्सिडी आदि का लाभ दिया जाना चाहिए।
राणा प्रताप सिंह
किताबों का चलन कम हो गया है। पहले एक ही विषय की अलग-अलग लेखन की किताबों की मांग रहती थी। अब बच्चे यूट्यूब और पीडीएफ फाइलों से पढ़ाई कर ले रहे हैं।
राजेश पांडेय
सरकारी विभागों में बजट आने के बाद भी बाहरी आपूर्तिकर्ता से सामान खरीदा जाता है। उन्हें स्थानीय स्तर पर काम नहीं मिलता है। इस तरह की परिपाटी पर रोक लगनी चाहिए।
संजय कुमार
प्राइवेट स्कूलों में खुली स्टेशनरी की दुकानों पर रोक न लगने से दुकानदारी पर असर पड़ रहा है। इसकी शिकायत करने पर अधिकारी इसमें रूचि नहीं लेते हैं।
टिंकू सिंह
सरकारी कार्यालय में समय पर भुगतान नहीं होता है। बकाया लेने के लिए दौड़ना पड़ता है। इस कार्य में मुनाफा कम होता है। ज्यादातर दुकानदार खुद ही दिन भर दुकान पर बैठते हैं।
जगदीश महतो
निजी विद्यालयों में कॉपी, किताब और स्टेशनरी बेचने पर रोक लगनी चाहिए। इस तरह तो दुकानदारों के लिए काम करना ही मुश्किल होगा।
बसंत कुमार
अभिभावक को विद्यालय में कॉपी, किताब खरीदने के लिए बाध्य नहीं किया जाए। दुकानों में उन्हें उचित कीमत देनी होती है लेकिन स्कूल में ज्यादा पैसे लगते हैं। प्रशासन को इस ओर ध्यान देना चाहिए।
गौरव राज
प्राइवेट स्कूलों ने हमारे कारोबार को अपना लिया है। दुकानदार आखिर क्या करें। ऑनलाइन बिक्री से वे पहले ही परेशान थे। उन्हें कोई रोकने वाला नहीं है। हमारा धंधा मंदा हो रहा है
राजकिशोर साव
स्कूलों में पुस्तकों और स्टेशनरी की सामानों की बिक्री बंद हो। इस पर प्रशासन को ध्यान देने की जरूरत है। इस धंधे से लोग अलग हट रहे हैं क्योंकि बचत कम होती जा रही है।
अमित कुमार
दुकान में बिक्री नहीं होने के कारण दुकानों का किराया देने में भी परेशानी होती है। पूरे दिन दुकान में बैठ कर ग्राहक का इंतजार करना पड़ता है। आमदनी नहीं होने से दिक्कत है।
प्रवीण कुमार
ऑनलाइन बाजार के कारण स्टेशनरी कारोबार प्रभावित हुआ है। स्टेशनरी दुकान संचालकों के लिए भी कोई योजना सरकार को बनानी चाहिए। उनके बारे में किसी भी स्तर पर विचार नहीं होता है।
नरेंद्र कुमार
मुफ्त कॉपी, स्टेशनरी योजना में स्थानीय कारोबारी को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। उन्हें नियमों में छूट मिलनी चाहिए। सरकार को इसपर ध्यान देना चाहिए।
लक्ष्मीकांत मिश्रा
दुकानदारों को सस्ता कर्ज मुहैया कराया जाना चाहिए। उनके पास पूंजी का अभाव रहता है। ऑनलाइन बाजार से वे परेशान हैं। यदि उनकी सहायता होती है तो राहत मिल सकती है।
विजेता कुमार
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